दामिनी के विरुद्ध - लेख - डॉ. कविता वाचक्नवी

इन दिनों नेट पर, पत्र-पत्रिकाओं में लोग भावविह्वलता में दिल्ली में नृशंसता की शिकार हुई दामिनी के नाम पर कविताएँ लिख रहे हैं, गीत, छन्द, मुक्तक लिख रहे हैं ...... और इस भावुकता में उसे 'बलिदानी', कह कर उसका महिमा-मंडन कर रहे हैं, उसके त्याग और बलिदान का गुणानुवाद कर रहे हैं । (जबकि वह नृशंसता की 'शिकार' थी)।
"अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली स्त्री ही महान होती है' की सामाजिक मानसिकता के चलते हमारे घरों में लड़कियों को अपने सारे सुख-चैन को तिलांजलि देकर सब कुछ बलिदान कर महान बनने व तभी सम्मान अर्जित करने योग्य हो पाने की घुट्टी पिलाई जाती है....... । जो स्त्री अपने सुख, स्वास्थ्य, सम्मान, निर्णय, इच्छा, आवश्यकता, शौक या अपनी किसी भी तरह की परवाह न कर परिवार व दूसरों के लिए घुट-घुट कर मर जाए, त्याग पर त्याग करती रहे या अपने बारे में कदापि न सोचे, उसे ही सदाचारी, महान, सुसंस्कृत, सन्नारी माना जाता है। इस चक्कर में लड़कियाँ और महिलाएँ अपने जीवन को गला-गला कर भी दूसरों की नजर में थोड़े से सम्मान व इज्जत के लिए तरसती अपना आप खोती रहती हैं।
इसी भेदभाव के चलते ही समाज में ऐसी नृशंस घटनाएँ अनवरत होती रहेंगी क्योंकि स्त्रियाँ किसी न किसी की जागीर बनी रह कर उनके अधिकार क्षेत्र में आएँगी कि वे चाहे जैसे उन्हें जोतें या चाहे जैसे उन्हें इस्तेमाल करें। वे तो केवल धरती की तरह चुपचाप सब कुछ सहती हुईं सर्वस्व देने को सदा प्रस्तुत रहेंगी। और फिर समाज उनके इस बलिदान ( छीन कर लिए गए ) के बदले उन्हें श्रद्धा के सिंहासन पर बिठाकर देवी की तरह पूजने लगेगा । .......और महिमामंडन के बहाने अपने अपराधों, अन्यायों को उसकी दिव्यता की अनिवार्य शर्त व कसौटी बनाए रखेगा। स्त्री को मान देने की अपेक्षा हमारे समाज में उसके गुणों (वे भी उसके शोषण के लिए आरोपित किए हुए) को महत्त्व देने की रूढ़ि चली आती रही है,
- 'पत्नी पथ-प्रदर्शक' लिखे गए, उसके त्याग को सामाजिक उत्सव व आयोजन बनाया गया
- सती की पूजा होती रही और उसके नाम पर देवालय स्थापित हुए
- परदे में रहने को उसकी सच्चरित्रता से जोड़ा गया
- बचा-खुचा खा लेने को उसके सन्नारी होने का पर्याय माना गया
- उसके सर्वस्व लुटा कर बलिदान हो जाने को मातृत्व का पर्याय माना गया
- उसके केशमोचन करा रूखा-सूखा खा बिना बिछौने सो जाने को सके वैधव्य की तपस्या के साथ जोड़ा गया
- पतियों के व्यभिचार की अनदेखी को उसके बडप्पन व घर को बचाए रखने के औदार्य का नाम दिया गया
- ससुराल से अर्थी पर विदा होते समय ही निकलने को उसके सुखी विवाहिता होने
- माता-पिता की लाज निभाने के प्रण को जान देकर भी निभा लेने के साहस से जोड़ा गया
- पिट-पिट कर नीले हो जाने से लेकर गंभीर घायल तक हो जाने पर भी गिर पड़ने का बहाना कर चुपचाप अगली सुबह समाज को 'सब कुछ बढ़िया है' का भ्रम देने को पति की मान-मर्यादा का सम्मान करने का नाम दिया गया
- घरों के भीतर ही भीतर चलने वाले पापाचारों को छिपा-झेल कर दांत में जीभ दबाए जीवनभर निभा ले जाने को सतवंती नार का लक्षण कहा गया
- बेमेल विवाह से लेकर सौदा हो जाने तक को परिवार की लाज बचाने के लिए दिया गया बलिदान कहा गया
- गऊ की तरह खूँटे से बंधे रहकर दुहे जाने को तत्पर रहना,
- धरती की तरह सब कुछ सह सबको क्षमा करते चले जाना,
- अपनी देह को लज्जा की वस्तु समझ उसके लिए शर्मिन्दा होते रह उसे लुकाए-छिपाए रहना और लज्जा का प्रतिमान होना,
- कभी भी छोड़ दी जाने को शापित रहना,
- घरों, मोहल्लों व बाजारों में किसी के भी द्वारा छेड़छाड़ पर आपत्ति न कर स्वयं पर ही शर्मिन्दा हो रोना-घुटना और सरेआम तमाशा बनना,
लडकियाँ/ महिलाएँ इस सम्मान को पाने के लिए जीवनभर जुटी रहती हैं, परस्पर दौड़ मची रहती है उनमें, कि मालिक लोग किसे तमगा देते हैं, कैसे तमगा प्राप्त किया जाए। उसे दबाने कुचलने वाले ही उसे पुरस्कार देने वाली ज्यूरी बनते हैं, क्योंकि उनके पास विधिवत् मारने-पीटने, लज्जित-प्रताड़ित करने, सताने-धमकाने, छल-कपट कर इस्तेमाल करने का आधिकारिक लाईसेंस होता है। स्त्रियाँ इन लाईसेंस धारकों से प्रमाणपत्र लेने के लिए कतार में लगी रहती हैं, जुटी रहती हैं, कभी कभी हाथापाई तक करती हैं, अपनी बेगुनाहियों के सबूत जुटाती देती रहती हैं और इस सारे में मची भागदौड़ के बीच नरपिशाच अपनी कीमत लेते रहते हैं, अपनी शक्ति और अधिकार का प्रदर्शन व प्रयोग कर महिलाओं की महिमा जाँचते (?) रहते हैं। उनके हिंसक से हिंसक और बीभत्स से बीभत्स शक्ति प्रयोग को झेल ले जाने वाली लड़कियों / स्त्रियों को वे बड़े बड़े तमगों से सुशोभित करते हैं।


0 comments:
Post a Comment