"युद्ध नहीं" - ओम थानवी

, by शब्दांकन संपादक


जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी बीते दिनों पाकिस्तान गए थे
 पाकिस्तान में वो ठीक उसी समय थे, जब भारतीय सैनिकों के सर काटे जाने की घटना हुई अपने इस यात्रा वृत्तांत में उन्होंने भारत-पाकिस्तान रिश्ते और उन से जुड़ी भौगोलिक, सामयिक और इंसानी परिस्थितियों को तटस्थ रूप में लिखा है । "युद्ध नहीं चाहिये - ये कहना डरपोक होने की निशानी नहीं है" । - संपादक

"युद्ध नहीं" -  ओम थानवी 

    इस बार सड़क मार्ग से लाहौर जाना हुआ। गुमान था कि एक संधि-रेखा की ही तो दूरी है। इधर हम, उधर वे। विमान से जाने पर भूगोल दुबक जाता है। हमेशा लगा कि कहीं दूर जा रहे हैं।

   लेकिन सड़क ने भी वह दूरी पाटी नहीं। अमृतसर से एक बस ने हमें अटारी सीमा पर छोड़ा। पासपोर्ट पर ठप्पा लगवा कर कुछ कदम पार वाघा जा पहुंचे। वाघा पाकिस्तान में पड़ने वाला सीमांत है, जिसे हमारे यहां लोग भूल से अपना सीमांत समझते हैं। वाघा पहुंच कर उनका ठप्पा और आगे लाहौर की सड़क पर- जो सीमा से उतना ही दूर है, जितना दिल्ली राजधानी क्षेत्र में मेरा घर!

    मैंने मुड़कर हैरानी से सीमा-रेखा की ओर देखा। भारत और पाकिस्तान के जवान गश्त दे रहे थे। उसके आगे हमारी चौकी थी। पीछे अमृतसर, जहां सुबह हमने नाश्ता किया था। पर लगता था मीलों चल आए हैं। क्या इसलिए कि सरहद पार करने पर सारा मंजर बदल जाता है। मुल्क के उनके दरवाजे पर उसका रंग, जवानों की वर्दी, हमारी तरफ गांधी उधर जिन्ना की तस्वीर, एक तरफ हिंदी में स्वागत, दूसरी तरफ उर्दू लिपि में, उर्दू के नामपट्ट। बोलचाल वही, लेकिन थोड़ी-थोड़ी अजानी- बाहरको हर कोई बाहेरबोल रहा है!

    लेकिन नहीं। ये चीजें नहीं, जो चंद घड़ियों के सफर को बोझिल बना डालें। आप पैदल सीमा पार करें और आपको लगे कि पूरी पीढ़ी का वक्फा आपके साथ चलकर आया है। क्या चीज है जो दूरी को अवधि में नहीं, पीढ़ियों में तब्दील कर देती है? आप न कहीं आते हैं न जाते हैं, फिर भी आपको लगता है बरसों की दूरी नाप आए हैं!


    परस्पर अविश्वास और दुराव इसकी एक बड़ी वजह है, कम से कम इतना हमें दो-तीन रोज में खूब समझ आया। जिस रोज हमने सीमा पार की, उसी रोज जम्मू-कश्मीर में संधि-रेखा पार कर पाकिस्तान के घुसपैठियों ने- वे सैनिक थे या नहीं अभी साफ नहीं- दो भारतीय जवानों को मार डाला था। पर सीमा की खबर अखबारों में छपी दो रोज बाद।

    दरअसल हम लोग साफमा (साउथ एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन) की एक संगोष्ठी में शिरकत के लिए गए थे। सार्क क्षेत्र के आठ देशों के दो सौ से ज्यादा पत्रकार। इनमें अनेक संपादक भी थे। संगोष्ठी का नारा था: दिल और दरवाजे खोलिए! यह भी अच्छा प्रयोग था कि संगोष्ठी का उद्घाटन और शुरू के सत्र अमृतसर में हुए। बाकी सत्र और समापन लाहौर में! मैंने इससे पहले ऐसी कोई संगोष्ठी नहीं देखी थी, जो एक साथ दो देशों में संपन्न हो।

    अमृतसर में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने गर्मजोशी भरा भाषण दिया। कि ऐसे रिश्ते हों कि नाश्ता एक देश में करें, दोपहर का भोजन दूसरे देश में और रात का तीसरे में। पंजाब के मुख्यमंत्री ने भारत-पाक संबंधों को मियां-बीवी के संबंधों की संज्ञा दी: ‘‘इसमें न पड़ें कि मियां कौन है और बीवी कौन, उस तरह की अंतरंगता हमें कायम करनी है।’’

    लाहौर में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ संगोष्ठी में आए। उनके और अटल बिहारी वाजपेयीके दौर में हुई कोशिशों की चर्चा हुई। अगले रोज- 8 जनवरी को- गवर्नर हाउस में भोज का आयोजन था, जिसमें प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ मुख्य अतिथिथे।

    अखबारों में या पाक टीवी पर तब तक पुंछ के जघन्य कांड की खबर न थी। पर जिनके फोन में पाकिस्तानी सिम-कार्ड था (भारत-पाक के सिम एक-दूसरे देश में निषिद्ध हैं!), उन्हें दिल्ली वगैरह से खबर हो गई थी। जिन्हें नहीं थी, उन्हें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बर्ताव से कुछ असामान्य घटित होने का अंदेशा हुआ होगा। वे इस्लामाबाद से लाहौर इसी कार्यक्रम में शामिल होने आए थे; वे आए, बोले और भाषण खत्म होते ही फौरन मुड़कर तंबू के पीछे के दरवाजे से रुखसत हो गए।

    अपने भाषण में परवेज अशरफ ने पुंछ के हादसे का जिक्र नहीं किया। आपसी संबंध सुधारने की बात कही- कौन नहीं कहता!- और पत्रकारों की आसान आमदरफ्त की मांग से सहमति जाहिर की; (पाकिस्तान में प्रतिबंधित) यू-ट्यूब को रास्ते पर आने की सलाह भी दी। वे रुके होते तो कुछ पत्रकार उन्हें पुंछ के हादसे पर जरूर घेरते। यह अंदेशा उन्हें रहा भी होगा और शायद इसीलिए वे चल निकले।

    हम होटल के कमरे में उस रोज टीवी के चैनल पलटते रहे। भारत के अनेकानेक टीवी सीरियल वहां देखे जा सकते हैं, पर खबर नहीं। हमारे यहां भी उनके चैनल कानूनन बंद हैं; उनके सीरियल तो बहुत पहले पिछड़ चुके। उलटे उनके टीवी चैनलों पर भारत निशाने पर था। असल में पुंछ सीमा के उसी इलाके में भारत की ओर से हुई गोलाबारी में एक पाकिस्तानी जवान मारा गया था, एक घायल हो गया। मृत सैनिक के कस्बे से बिलखते परिजनों की खबरें थीं।

    अगले रोज हम दिल्ली लौटे, तब भारतीय चैनलों पर हमारे हताहत सैनिकों के बिलखते परिजन थे। उस जवान की बीवी को देख मन रो गया, जो कहती थी कि पति का शीश लाओ, वरना कैसे मानूं कि जिसे आप शहीद कहते हैं वह मेरा पति था! उसके साथ उसकी सास ने भी शीश न मिलने तक अन्न मुंह में न रखने की कसम खाई थी।

    सूचना-तंत्र का कैसा बखेड़ा आपसी सहमतिका हिस्सा है कि भारत और पाकिस्तान जब उदार आमदरफ्त, व्यापार आदि की अच्छी बातें और बंदोबस्त करते रहे, तब भी एक-दूसरे के अखबारों के वितरण और टीवी प्रसारण पर बंदिश बनी रही। दोनों ओर के शासकों में कोई यह समझने को तैयार नहीं कि सूचना का आना-जाना हालात सुधारने में ज्यादा मददगार हो सकता है, बनिस्बत सूचना छुपाने के। जब लोग इधर से उधर आ जा सकते हों, इंटरनेट और दूसरे देशों के मीडिया से दबी-छुपी खबरें मिल जाती हों, सूचना के आपसी आदान-प्रदान को खोल देने में क्या बुराई है?

    ऐसे में भारत के एक गांव में पति और बेटे के शीश की आस में अनशन कर लेटीं दो औरतों की पीड़ा पाकिस्तान में कोई कितनी समझेगा? बिलखते बच्चों की तकलीफ? ऐसे ही भारतीय सैनिक की गोली से मारे गए पाकिस्तानी जवान के घर-परिवार के जो दृश्य मैंने लाहौर में टीवी पर देखे, वे भी मन दुखाते थे। पर वे दृश्य भारत में कौन देख सकता था? दोनों ओर हर साल सैकड़ों सैनिक सीमा की झड़पों में मारे जाते हैं। दोनों ओर वे शहीदही कहाते हैं। पर एक तरफ की मौत- मुख्यत: सूचना के अभाव में- दूसरी तरफ मानवीय संवेदना को झकझोर नहीं पाती। अगर ऐसा होता तो मैं सोचता हूं, दोनों ओर गलतफहमी ऐर तनाव में जरूर कमी आती।

    10 जनवरी को हिंदूमें परवीन स्वामी ने सेना के सूत्रों के हवाले से लिखा था कि सिर काट लेने के वहशी हादसे सरहद पर पहले भी हुए हैं, दोनों तरफ। लेकिन वे मीडिया तक नहीं पहुंचे। इस बार बात पहुंची तो उसकी प्रतिक्रिया किसी विस्फोट की तरह हुई। यहां तक कि लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि एक के बदले हमें दस पाकिस्तानी जवानों के सिर काट लाने चाहिए।

    सुषमा स्वराज को मैं भाजपा का सबसे योग्य नेता मानता हूं। वे संघ परिवार की घृणामूलक राजनीति की नहीं, समाजवादी विचारधारा की उपज हैं। बाल ठाकरे जैसे नेता ने, जिन्होंने शायद ही कभी कोई वाजिब बात कही हो, यह ठीक कहा था कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद की योग्यता सुषमा स्वराज में है, नरेंद्र मोदी में नहीं। इसके बावजूद मैं शीश काटने की किसी बात को नितांत अ-भारतीय विचार मानता हूं; वह बात किसी नीतिशास्त्र में अनुमोदित नहीं होगी। हमारे स्तंभकार तरुण विजय ने भी प्रतिशोध की बात कही है। विचार प्रकट करना उनका अधिकार है, पर मैं प्रतिशोध के बजाय प्रतिशोध का शमन करने वाले विचार को ज्यादा बड़ा मानता हूं। प्रतिशोध अपने आप में एक हिंसक विचार है। हम हजारों-हजार साल से अहिंसा के विचारों में पलते आए हैं और संसार में इसी साख के बूते प्रतिष्ठा की जगह रखते हैं।

    पाकिस्तान की जघन्य और बेहूदा हरकतों ने- चाहे उन्हें किसी ने अंजाम दिया हो- और कुछ हमारे चुनिंदा टीवी चैनलों में राष्ट्रप्रेम की आड़ में दुकान चमकाने की होड़ ने लोगों में अजीबोगरीब उन्माद का संचार किया है। ऐरा-गैरा भी मार दो-काट दो-सबक सिखा दो की बात ऐसे करता है, जैसे गिल्ली-डंडा खेलने की बात हो रही हो। चार युद्ध पाकिस्तान के साथ हम लड़ चुके। चारों में पहल पाकिस्तान ने की। चारों में हार भी पाकिस्तान की हुई। लेकिन किसी युद्ध से न हमें कुछ हासिल हुआ, न पाकिस्तान को। ऐसे में पांचवें युद्ध की बात भारत क्यों छेड़ने बैठे? वह भी उस दौर में, जब दोनों देश आणविक ढेरी पर बैठे हों?

    सीमा पर तनाव और सिरफिरी हिंसा के नाम पर युद्ध की बात छेड़ने वालों को इंडियन एक्सप्रेसमें शेखर गुप्ता के स्तंभ में आए तथ्य देखने चाहिए। सरकारी आंकड़ों की रोशनी में उन्होंने बताया है कि 2003 में संधि-रेखा पर संघर्ष विराम समझौता होने से पहले हर साल चार सौ से छह सौ तक भारतीय जवान जान गंवाते थे (करगिल के हताहत शामिल नहीं)। पाकिस्तान में यह संख्या हमसे ज्यादा होती थी। समझौते के बाद संधि-रेखा की झड़पों और मौतों में दोनों तरफ कमी आई। 2006 के बाद इसमें भारी कमी आई है। इस तरह, जाहिर है, समझौते के संयम ने करीब आठ से दस हजार जवानों की जानें बचाई हैं। भाजपा शायद भूल जाती है कि 2003का यह समझौता अटल बिहारी वाजपेयी की देन था!

    भाजपा से ज्यादा गिला मुझे सत्ताधारी कांग्रेस से है। इस मामले में उन पर कोई गठबंधन का दबाव भी नहीं दिखाई देता। फिर शांति की प्रक्रिया पटरी से उतारने में एक हादसे की क्या बिसात? भले ही वह इतना अमानुषिक था कि उसे अंजाम देने वालों तक में सामने आने की हिम्मत नहीं। प्रधानमंत्री ने- और कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने भी- पहले संवाद का सिलसिला जारी रखने की बात की। यह भी आश्वस्त किया गया कि पैंसठ साल से ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों को सीमा पर वीजा देने का समझौता अडिग रहेगा।

    लेकिन इसके बाद बेहतर संबंध कायम नहीं रह सकते, यह बात होने लगी। फिर हॉकी टीम वापस, मंटो पर नाटक खेलने आ रहे रंगकर्मी खारिज, उदार वीजा नीति के साथ पैंसठ पार के बुजुर्गों की आमदरफ्त बंद। भारत-पाक संबंध बेहतर करने में मनमोहन सिंह की भूमिका कम नहीं रही है। क्या कांग्रेस भाजपा के उन्मादी अभियान को देख डर गई? यह सोचकर कि राष्ट्रवादी जुनून पैदा कर भाजपा कहीं इसी मुद्दे पर मतदाताओं को गोलबंद न कर ले? कांग्रेस को सोचना चाहिए, चुनाव अभी बहुत दूर हैं।

    कुल मिलाकर यह कि सरकार का इस तरह झुकना अच्छा नहीं। दोनों देशों में आम जनता एक दूसरे के खून की प्यासी नहीं है। आतंकवादी और फौज के गुनहगार संवाद की निरंतरता में ही किनारे किए जा सकते हैं। एक सिरफिरे हमलावर को पूरे देश का हमला समझना समझदारी का तकाजा नहीं हो सकता। किसी कायर दहशतगर्द- चाहे वह फौजी क्यों न हो- की कारगुजारी का दंड हर मासूम के मत्थे मढ़ना एक बेहतर मुकाम तक पहुंचा दी गई कूटनीति को विफल करने की कार्रवाई न बन बैठे, प्रधानमंत्री को इस पर जरूर सोचना चाहिए। दोनों देशों के बीच सरकार का सरकार से, लोगों का लोगों से, खिलाड़ियों, साहित्यकारों-कलाकारों का उनकी बिरादरी से मेल-मिलाप बढ़ेगा तो दहशतपसंद हतोत्साह ही होंगे।

    अंत में कविता: युद्ध-चर्चा के उन्माद के बीच महान तुर्की कवि नाज़िम हिकमत की एक युद्ध-विरोधी कविता का अंगरेजी अनुवाद पढ़ा। मेरे पिताजी ने हिंदी में उसका सुंदर अनुवाद कर दिया है। आप भी पढ़िए: 

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तेजेन्द्र शर्मा की कहानी "टेलिफ़ोन लाईन"

, by शब्दांकन संपादक


“पांच मिनट का इन्तज़ार तुमको इतना लम्बा लगा? यहां तो एक ज़िन्दगी ही निकल गई! ”
    टेलिफ़ोन की घन्टी फिर बज रही है।

    अवतार सिंह टेलिफ़ोन की ओर देख रहा है। सोच रहा है कि फ़ोन उठाए या नहीं। आजकल जंक फ़ोन बहुत आने लगे हैं। लगता है जैसे कि पूरी दुनियां के लोगों को बस दो ही काम रह गये हैं – मोबाईल फ़ोन ख़रीदना या फिर घर की नई खिड़कियां लगवाना। अवतार सिंह को फ़ोन उठाते हुए कोफ़्त सी होने लगती है। सवाल एक से ही होते हैं, “हम आपके इलाके में खिड़कियां लगा रहे हैं। क्या आप डबल ग्लेज़िंग करवाना चाहेंगे? ” या फिर “सर क्या आप मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करते हैं? ”

    ‘मैं फ़ोन इस्तेमाल करता हूं या नहीं, इससे आपको क्या लेना देना है? ’

    “सर हमारे पास एकदम नई स्कीम है। दरअसल ये कोई सेल्स कॉल है ही नहीं। हमारे कम्पयूटर ने आपका नाम सुझाया है, राईट! आपको फ़ोन एकदम फ़्री मिलेगा। राईट!  ..यू डू नॉट हैव टु पे ईवन ए पेन्नी फ़ार दि फ़ोन... ”

    “यार बिल तो मुझे ही देना पड़ेगा न?”

    एक दिन तो एक ने कमाल ही कर दिया। अवतार सिंह का नाम सुन कर बोला, “अंकल जी मैं दिल्ली तों टोनी बोल रिहा हां। अंकल जी प्लीज़ फ़ोन ले लीजिये न। मेरा टारगेट नहीं हो पा रहा। प्लीज़! ”

अवतार ने फिर टेलिफ़ोन की तरफ़ देखा है। प्रतीक्षा कर रहा है कि आंसरिंग मशीन चालू हो जाए तो बोलने वाले की आवाज़ सुन कर ही तय करेगा कि फ़ोन उठाना है या नहीं।

किसी ज़माने में पिंकी के फ़ोन की कितनी शिद्दत से प्रतीक्षा होती थी। फिर पिंकी का फ़ोन और उसका फ़ोन एक हो गये थे। पिंकी अपने पिता का घर छोड़ कर अवतार के पास आकर उसकी पत्नी बन कर रहने लगी थी। कुछ साल तो सब ठीक चलता रहा। लेकिन फिर जैसे उनके संबंधों के नीचे से ज़मीन भुरभुरी होती चली गई।
    .... फ़ोन ज़रूर किसी सेल्स वाले का ही होगा। संदेश नहीं छोड़ रहा।

    पिंकी भी बिना कोई संदेश छोड़े उसे अकेला छोड़ गई थी। पिंकी के इस तरह उसके जीवन से निकल जाने ने अवतार के व्यक्तित्व पर बहुत से गहरे निशान छोड़े हैं। उसे आज तक समझ ही नहीं आया कि कमी कहां रह गई। क्या हालात सचमुच इतने बिगड़ गये थे कि पिंकी को घर छोड़ कर जाना पड़ा?

पिंकी अवतार को छोड़ कर उसके दोस्त अनवर के साथ भाग गई। सुना है आजकल तो पूरा बुरका पहन कर घर से निकलती है। अवतार हैरान भी है और परेशान भी। पिंकी के भागने से अवतार को बहुत से नुक़्सान हुए हैं। पहले तो दोस्ती पर से विश्वास उठ गया है। फिर मुसलमानों के विरुद्ध उसके मन में गांठ और पक्की हो गई है। हालांकि कुसूर पिंकी का भी उतना ही था जितना कि अनवर का।

पिंकी मुसलमानों के विरुद्ध कितनी बातें किया करती थी! वह तो बुरक़ा पहनने वाली औरतों को बन्द गोभी तक कहा करती थी! फिर ऐसा क्या हो गया कि वह स्वयं औरत न रह कर बन्द गोभी बनने को तैयार हो गई?

    अनवर जब लंदन आया था तो उसका पहला दोस्त अवतार ही बना था। अनवर मिघयाणे का रहने वाला था। जगह का नाम सुनते ही अवतार की आंखें नम हो आईं थी। उसके अपने माता पिता हमेशा ही झंग की बातें करते थे। झंग और मिघयाणा तो जैसे जुड़वां शहर थे। अनवर की बोली भी अवतार के माता पिता की बोली से कितनी मिलती जुलती थी। अनवर जब बोलता तो अवतार बस सुनता रहता। अनवर हीर बहुत मीठी गाता था।

    हीर के मकबरे की बातें करता अनवर अपनी आंखों में पानी ले आता। हीर माई की बातें और तख़्त-हज़ारे का रांझा - दोनों दोस्त ख़्यालों के सागर में नहाते रहते। और फिर एक दिन हो गई थी अवतार की शादी और अनवर को भी घर का खाना मिलने लगा था। वरना तो दोनों दोस्त हाउंसलों के ढाबे-नुमा रेस्टोरेण्टों की कमाई बढ़ाने का काम करते रहते थे। तीनों इकठ्ठे फ़िल्में देखने भी जाते थे। आख़री फ़िल्म बार्डर ही देखी थी तीनों ने। और पिंकी घर की सीमा पार कर उस पार चली गई थी।

    अब तो संदेसे भी नहीं आते। बस कभी कभी कोई समाचार आ जाता है। जब अवतार का कोई दोस्त सायरा को साउथहॉल या ईलिंग रोड की मुख्य सड़कों पर ख़रीददारी करते देख लेता है तो चुटकी लेते हुए अवतार को बताता ज़रूर है। पिंकी को सायरा बानू नाम भी पसन्द था और इस नाम की फ़िल्मी हिरोईन भी सुन्दर लगती थी। उसने कई बार अवतार से कहा भी था, “मैं किहा जी, मैं अपना नाम सायरा बानू रख लवां? किन्ना प्यारा नाम लगदा है! ” शायद यही नाम रखने के लिये ही वो मुसलमान हो गई!

    फ़ोन फिर बजने लगा है। बे-ध्यानी में उसने उठा भी लिया है। फ़ोन श्रीवास्तव जी का है। अवतार समझ गया कि चालीस पैंतालीस मिनट का नुस्ख़ा तो हो गया। श्रीवास्तव जी के साथ उसकी बातचीत कम से कम इतनी तो चलती ही है। श्रीवास्तव जी की पत्नी तो अवतार को अपनी सौतन कह कर बुलाती है। लेकिन प्यार भी बहुत करती हैं। श्रीवास्तव जी उम्र में भी अवतार से बड़े हैं। पांच सात साल तो बड़े होंगे ही। कट्टर मार्क्सवादी हैं। कभी कभी अवतार को भी बोर कर देते हैं। अवतार किसी वाद विवाद को नहीं मानता। इन्सानियत उसका धर्म है और इन्सानियत ही ज़िन्दगी। वो स्वयं न तो गुरुद्वारे अरदास करने जाता है और न ही मंदिर में पूजा करने। 

    अवतार की मां सिख थीं और पिता हिन्दू। मां ने अवतार को सिख धर्म की सीख दी। लेकिन माता पिता दुर्गा के मंदिर भी उसी श्रद्धा से जाते थे जैसे कि गुरूद्वारे। घर में गुरू नानक और श्री कृष्ण जी की फ़ोटो साथ साथ टंगी रहतीं। अवतार को भगवान कृष्ण के सिर में लगा मोर का पंख बचपन से ही आकर्षित करता था। हालांकि श्रीवास्तव जी के साथ वह नीस्डन के स्वामी नारायण मंदिर भी चला जाता और साउथहॉल के गुरूद्वारे में लंगर भी खा आता। लेकिन श्रद्धा वाली कोई बात नहीं थी।


    श्रीवास्तव जी ने नई ग़ज़ल लिखी है। वे जब जब कोई नई नज़्म या ग़ज़ल कहते हैं, बेचारे अवतार पर ही ज़ुल्म ढाते हैं ! अवतार भी उनकी रचनाओं का आनंद उठाता है। दोनों दोस्त कभी कभी दोपहर को भोजन  भी इकट्ठे कर लेते हैं। श्रीवास्तव जी अवतार के कम्पयूटर को हिन्दी भी सिखाते हैं और गुरमुखी भी। लेकिन कम्पयूटर के सीख लेने के बावजूद अवतार कम्पयूटर के मामले में अपने को अनाड़ी ही पाता है। दोनों को जब कभी कोई नया लतीफ़ा कहीं से सुनने को मिलता है, तो दूसरे के साथ जल्दी से बांट लेते हैं। अवतार का तकिया कलाम रहता है, “हां जी, कोल कोई खलोता तां नहीं ? .. लो फिर ताज़ा ताज़ा हो जाए।” फिर दोनों दोस्त देर तक हंसते रहते। 

    श्रीवास्तव जी ने कभी भी अवतार से पिंकी के बारे में बातें नहीं कीं। श्रीवास्तव जी का परिवार अवतार के जीवन में पिंकी के जाने के बाद ही आया। अवतार को अच्छा भी लगता है कि श्रीवास्तव जी ने कभी भी उसकी निजि ज़िन्दगी के बारे में कभी कुछ नहीं पूछा। उसे अपनी आंखों में आंसू बिल्कुल पसन्द नहीं हैं !
फ़ोन रख दिया है। श्रीवास्तव जी की नई नज़्म हैरो शहर पर लिखी गई है। वही सुना रहे थे। अवतार के दिमाग़ में दो पंक्तियां अभी भी गूंज रही थीं, “बाग़ में जिसने बना डाले भवन / तय करो उसकी फिर सज़ा क्या है ! ” हाउंसलो ही की तरह हैरो की भी शक्ल बदल रही है। बदल तो उसकी अपनी ज़िन्दगी भी बहुत गई है। आज पिंकी बहुत याद आने लगी है। पिंकी और अनवर, भारत और पाकिस्तान, हिन्दू और मुसलमान – सभी उसके दिमाग़ को मथ रहे हैं। अचानक ये सब उसे अपने स्कूल में पहुंचा कर खड़ा कर देते हैं। 

 
 फ़ोन की घंटी फिर बज उठी है। अवतार ने गिलास में व्हिस्की डाल ली है। वह रोज़ाना शाम को व्हिस्की के दो पैग लेता है। जब कभी यादें सुकून से खिलवाड़ करने लगती हैं, वह दो से तीन तक भी पहुंच जाता है। उसकी प्रिय व्हिस्की है कुछ नहीं । जब पहली बार श्रीवास्तव जी ने इस व्हिस्की के बारे में बताया था तो वह अपनी हैरानी नहीं छिपा सका था। कुछ नहीं ! भला इस नाम की भी स्कॉच व्हिस्की हो सकती है ? श्रीवास्तव जी ने ही बताया था कि यह व्हिस्की एक भारतीय मूल के व्यक्ति के दिमाग़ की उपज है। आप व्हिस्की पियो तो भी कुछ नहीं पियोगे और अगर नहीं पियोगे, तब तो कुछ पी ही नहीं रहे !.. वैसे अब जीवन में कुछ बचा ही कहां था ?

    जब से अनवर से दोस्ती टूटी है, व्हिस्की ज़रूरत सी बन गयी है। मुश्किल यह है कि जब अनवर की याद सताने लगती है तो व्हिस्की पीकर बिना भोजन किये ही सो जाता है। किन्तु अनवर को भुलाने की तमाम कोशिशें नाकाम ही रहती हैं। क्योंकि अनवर के साथ ही जुड़ी हैं पिन्की की यादें। भला अपनी ज़िन्दगी को कोई कैसे भूल सकता है ? आजकल मीट भी नहीं बनाता है। भला अकेले बन्दे के लिये क्या भोजन पकाना ? मीट खाना लगभग छूट ही गया है।

    स्कूली जीवन में भी मीट कहां खाता था। घर में मां और पिता दोनो ही शाकाहारी थे। अवतार की बहन निम्मो भी शाकाहारी है। अवतार ने ख़ुद भी लंदन आकर ही मीट खाना शुरू किया था। हालांकि जानता था कि इन्सान को मीट नहीं खाना चाहिये। बहुत देर तक शाकाहार पर लेक्चर दे सकता था। लेकिन फिर भी दोस्तों के साथ बैठ कर मीट खा लेता था। हां एक बात तय थी कि न तो वह गाय का मीट खाता और न ही सुअर का गोश्त। ले दे कर चिकन और मछली ही खा पाता था।

    स्कूल में भी एक दिन उसके दोस्त ने उसे मछली पेश की थी। मगर उन दिनों कहां खा सकता था मछली। मछली की महक से ही उबकाई महसूस हुई थी। तभी अचानक एक आवाज़ सुनाई दी थी, “अरे कहां पंडित जी को मछली खिला रहे हो ?.. तुम सचमुच के सरदार तो हो न ? या खाली बस पगड़ी सजा रखी है सिर पर ? ”
यह आवाज़ थी सोफ़िया की। सोफ़िया भी दसवीं में पढ़ रही थी; वो भी विज्ञान की विद्यार्थी थी; फिर भी अवतार से अलग कक्षा में बैठती थी। सोफ़िया पढ़ रही थी बायलॉजी यानि कि मेडिकल साइंस और अवतार पढ़ रहा था मैकेनिकल और ज्योमैट्रिकल ड्राइंग यानि कि उसका लक्ष्य था इन्जीनियर बनना। इसलिये विज्ञान के विद्यार्थी होने के बावजूद दोनों अलग अलग क्लास में बैठने को मजबूर थे।

    किन्तु दोनो की क्लासों के कमरे कुछ इस तरह के कोण बनाते थे, कि खिड़की  में से दोनो एक दूसरे को निहार सकते थे। और दोनों यही किया भी करते थे। अवतार ज़रा झेंपू किस्म का लड़का था और सोफ़िया दबंग। सो लड़कों वाले सभी काम सोफ़िया को ही करने पड़ते। यद्यपि अवतार सोफ़िया को प्रेम का संदेश कभी प्रेषित नहीं कर पाया, फिर भी स्कूल में दोनों को लेकर खुसर-फुसर ज़रूर शुरू हो गई थी। ढिंढोरची अरुण माथुर तो एक एक को बताता फिरता, “बेटा देख लियो, सोफ़िया तो थोड़े दिनों में फुला हुआ पेट ले कर चलती दिखाई देगी। यह साला सरदार ऊपर से शरीफ़ बना फिरता है। ख़ूब खेला खाया है। तुम क्या समझते हो छोड़ता होगा ऐसे माल को। गुरू, पेल रहा है आजकल, ज़ोरों शोरों से। और सोफ़िया साली कौन सी कम है, लूट रही है मज़े, सरदार के साथ भी, और नसीर सर के साथ भी। ऐश हैं लौण्डी के, दोनों टाईप का मज़ा है गुरू।”

    अवतार को इतनी ओछी बातें कभी पसन्द नहीं आईं। वह चुप रह जाता। लेकिन सोफ़िया कहां चुप रहने वालों में थी, “अबे जा तूं, पेट फुलाउंगी तो अपना; मज़े लेती हूं तो मैं लेती हूं;... तूं क्यों मरा जा रहा है? जानती हूं तेरे बस का तो कुछ है नहीं। तूं तो ढंग से पेशाब ही करले, तो भी हो गई तेरी कमाई।”

    माथुर की मर्दानगी पर चोट होती तो वह तिलमिला जाता। लेकिन न तो वह स्वयं ही  चुप होता और न ही सोफ़िया। जब से पिंकी अनवर के साथ भाग गई है, तब से अवतार को सोफ़िया की याद शिद्दत से सताने लगी है, “कहां होगी, क्या करती होगी, कैसा परिवार होगा। उसकी शादी तो हायर सेकण्डरी के बाद ही हो गई थी। अब तो उसके बच्चे भी जवान होंगे।” 

    अवतार और पिंकी तो अपना परिवार भी शुरू नहीं कर पाये। जब से लंदन आया है अपने हाथ का बना या ढाबे का खाना खाने को अभिशप्त है अवतार। अपने आप को व्यस्त रखने का प्रयास करता है। दोस्तों की एक लम्बी से फ़ेहरिस्त है। इंटीरियर डेकोरेटर का काम है अवतार का, दूसरों के घर सजाता है, लेकिन अपना घर नहीं बसा पाया। 

    बेचैन हो उठा है अवतार, उठ कर म्यूज़िक सेंटर के पास जाता है, शिव कुमार शर्मा का सी.डी. लगा देता है। संतूर की लहरियों पर दिमाग़ बेलगाम तैरने लगता है। स्कूल यूनिफ़ॉर्म में सोफ़िया फिर सामने आ खड़ी हुई है। उसके पिता तो राष्ट्रपति भवन में ही काम करते थे। उसका तो घर भी वहीं प्रेसिडेन्ट्स इस्टेट में था। लंदन आने के बाद एक बार गया भी था वहां। अपना स्कूल देखने के बहाने गया था। अपने स्कूल को भुला पाना भी कौन सा आसान काम था। सोफ़िया जिस क्लास में बैठती थी; जिस कॉरीडोर में चलती थी; जहां पहली बार उसके हाथ से हाथ मिलाया था... वो सब उसकी यादों के धरोहर हैं। 

    पता चला था कि सोफ़िया के अब्बा रिटायर हो कर जमुना पार किसी कालोनी में फ़्लैट ख़रीद कर वहां चले गये हैं। अब तो असली दिल्ली जमुना पार ही बसती है। हालांकि वहां वाले पुराने लोग आज भी जब जमुना पार करते हैं तो कहते हैं कि दिल्ली जा रहे हैं। अवतार ने अपने स्कूल को एक नया कम्पयूटर दान में दिया। आंखों में गीलापन लिये बस इतना ही कह पाया, “सर, इस स्कूल से इतना कुछ पाया है कि यह कर्ज़ तो कभी नहीं उतार सकता।”

    अब तो प्रिंसिपल भी बदल गये हैं। उसके ज़माने में तो बेदी साहब प्रिंसिपल हुआ करते थे। करीब छ : फ़ुट लम्बा कद, भरा हुआ शरीर, देखने में एकदम इटैलियन लगते थे। पूरा स्कूल उनसे डरता भी था। आज प्रिंसिपल के कमरे के बाहर की तख़्ती बता रही है – ओम प्रकाश गुप्ता। तख़्ती हिन्दी में ही लगी है। बेदी साहब की शायद अंग्रेज़ी में थी। वैसे क्या फ़र्क पड़ता है कि तख़्ती किस भाषा में है। प्रिंसिपल तो प्रिंसिपल ही रहेगा। प्रिंसिपल के कमरे के सामने एक खाली स्थान था जहां कुछ फूलों के पौधे लगे थे। उसके बाद दूसरा बराम्दा था। और वहां था कंट्रोल रूम।

   उस कंट्रोल रूम के इंचार्ज हुआ करते थे, सर आर. के. सीम। सीम सर से एक बार पूछा भी था कि उनके सरनेम का अर्थ क्या है। वे बस मुस्कुरा कर रह गये थे। सीम सर ड्राइंग भी पढ़ाते थे और कंट्रोल रूम भी देखते थे। अवतार की आवाज़ बहुत सुरीली थी। स्कूल में जब सुबह की प्रार्थना होती थी तो अवतार ही मुख्य गायक की तरह पहले प्रार्थना शुरू करता। बाकी तमाम बच्चे उसके पीछे पीछे गाते। अवतार जब जब एसेम्बली के सामने जा कर प्रार्थना शुरू करता, सोफ़िया उसे निहारती। शरमाता हुआ अवतार अपना काम करता जाता। यदि किसी दिन बरसात हो रही होती तो अवतार को कंट्रोल रूम से ही प्रार्थना की शुरूआत करनी होती। उसदिन उसे सोफ़िया की मुस्कुराहट कंट्रोल रूम के बेहिसाब बटनों में ही ढूंढनी पड़ती। सोफ़िया के लिये उस दिन प्रार्थना का कोई अर्थ ही नहीं होता।

    इस कंट्रोल रूम में इतने बटन लगे रहते कि इस के भीतर का माहौल खासा रहस्यमयी लगता था। यदि स्कूल की ओर से कोई घोषणा करनी होती, तो कंट्रोल रूम से सीम सर या प्रिंसिपल वो घोषणा कर देते। यदि किसी क्लास में शोर हो रहा होता तो कंट्रोल रूम में उस क्लास की पूरी आवाज़ सुनाई दे जाती, और फिर गूंजती सीम सर की आवाज़, “क्लास टेंथ-ए, मानीटर कम टू दि कंट्रोल रूम। इतना शोर क्यों हो रहा है।” टेंथ-ए का मानीटर तो अवतार ही था। कई बार उसको भी बुलाया जाता था। 

    वैसे उसकी अपनी क्लास की सुनीता भी उसे चाहने लगी थी। अपने घर मिण्टो रोड ले कर भी गई थी। उस दिन वह घर पर अकेली थी। लेकिन अवतार को समझ नहीं आया कि सुनीता उसे अकेले अपने घर क्यों ले गई, “अरे जब ममी पापा घर पर नहीं हैं, तो मुझे आने को क्यों कहा? तुमको तो मैं स्कूल में भी मिल लेता हूं।” आज सोचता है तो अपने पर स्वयं ही हंसी आ जाती है। लेकिन अब सुनीता का पता नहीं कि कहां है।
    फ़ोन फिर बजा है। अचानक उसे एक शरारत सूझती है। सोचता है कि थोड़ी देर रॉंग नंबर पर ही बात कर ली जाए। फ़ोन उठाता है, “हलो! ”

    “हलो, इज़ दैट अवतार सिंह! ”

    आवाज़ की भारतीयता को पहचानते हुए अवतार हिन्दी में ही बोला, “जी मैं अवतार सिंह ही बोल रहा हूं।”

    “अवतार, मैं सोफ़िया बोल रहीं हूं दिल्ली से।” आवाज़ में एक घबराहट भरी तेज़ी थी, “प्लीज़ मेरा नंबर नोट कर लो और मुझे दिल्ली फ़ोन करो। तुम से ज़रूरी बात करनी है।”

    अवतार ने यह भी नहीं पूछा कि कौन सोफ़िया; और अभी बात क्यों नहीं कर पा रही; अवतार क्यों फ़ोन करे। बस काग़ज़ उठाया और फ़ोन नंबर लिखने लगा। 

    फ़ोन क्लिक से बंद हुआ और अवतार फ़ोन हाथ में लिये ही खड़ा रह गया। कितने हक से सोफ़िया ने आदेश दे दिया था कि फ़ोन करो। और अवतार भी तो कुछ कह नहीं पाया। मन में द्वन्द्व है कि फ़ोन करे या न करे। वह जानता है कि वो फ़ोन करेगा। सोफ़िया का फ़ोन हो, तो वह कैसे वापिस फ़ोन किये बिना रह सकता है। 

    अवतार ने महसूस किया कि उसके हाथ कांप रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी किसी के व्यक्तित्व का इतना गहरा असर हो सकता है क्या? हो सकता हो या नहीं, किन्तु हो तो रहा है। दिमाग़ सवाल पर सवाल पूछे जा रहा है, “आज कल देखने में कैसी लगती होगी?.. कितन बच्चे होंगे? पति है या मर गया?... कहीं मुझ से शादी तो नहीं करना चाहती?... क्या मैं किसी मुसलमान औरत से शादी कर सकता हूं...क्या अनवर और पिंकी की घटना के बाद वह किसी मुसलमान के प्रति कोमल भावनाएं महसूस कर सकता है.. और अगर शादी हुई ते कैसी होगी?.. कोर्ट में या फिर निकाह? ” फिर अपने आप पर कोफ़्त होने लगी। क्या बेहूदा बातें सोचने बैठ गया है वो? पता नहीं उसे क्या ज़रूरत आन पड़ी है।... कहीं पैसे तो नहीं मांगेगी? क्या फ़र्क पड़ता है अगर मांग भी ले तो। कम से कम उससे बात तो होगी। पैसे देना या न देना तो मुझ पर निर्भर करता है। 

    अवतार ने एक नम्बर कहीं लिख कर रखा है जहां भारत की टेलिफ़ोन कॉल पांच पैंस प्रति मिनट में हो जाती है। सोचा बात तो लम्बी चलने ही वाली है। वैसे भी पिछले दो तीन वर्षों में टेलिफ़ोन कॉल की दरों में भारी कमी आई है। पांच वर्ष पहले तो भारत फ़ोन करना एक गुनाह जैसा लगता था। एक पाउण्ड बीस पेंस प्रति मिनट। दरें इतनी मंहगी थीं, कि बात की चुभन जेब तक पहुंच जाती थी।

    स्कूली अवतार ने सोफ़िया का नंबर मिला ही लिया। फ़ोन का नंबर मिलाते मिलाते पिंकी, अनवर, श्रीवास्तव जी, सुनीता सभी धुंधले पड़ते जा रहे थे। अवतार को अर्जुन की तरह केवल सोफ़िया ही दिखाई दे रही थी। फ़ोन की घन्टी बजते ही सोफ़िया ने फ़ोन उठा लिया, “हेलो अवतार!...फ़ोन करने में पूरे पांच मिनट लगा दिये! मैं घबरा रही थी कि तुम फ़ोन करोगे या नहीं।”

    “पांच मिनट का इन्तज़ार तुमको इतना लम्बा लगा? यहां तो एक ज़िन्दगी ही निकल गई! ”

    “अरे तुम को तो बोलना भी आ गया!.. फ़ैन्टैस्टिक!... मुझे तो डर था कि जो नम्बर मुझे मिला, वो ठीक है या नहीं।”

    “कहां से लिया मेरा नंबर?...वैसे कैसी हो?...तुम्हारी आवाज़ तो आज भी वैसी ही है।”

    “अरे मेरा क्या पूछते हो। मैं तो कॉलेज तक भी नहीं पहुंच पाई। स्कूल के बाद ही मेरे कज़न से मेरी शादी हो
गई थी। मेरे चाचा का ही लड़का था – जावेद। ..दि बास्टर्ड लेफ़्ट मी विद टू किड्ज़।”

    “क्या! छोड़ गया तुम्हें!” अचानक रोशनी की एक लकीर अवतार की आंखों के सामने झिलमिला उठी। हुआ     क्या”

    “उसे हमेशा से शक था कि मेरा किसी हिन्दू लड़के से चक्कर है। ... वो बस उस लड़के को कोई नाम, कोई चेहरा देने के चक्कर में था।... गधे को पता नहीं कि हमने ज़िन्दगी में बस एक ही लड़के को पसन्द किया था... और वो हिन्दू नहीं था... सरदार था!”

    “अरे हिन्दू और सरदार में कोई फ़र्क थोड़े ही होता है।... तुम्हारा तो पता नहीं, लेकिन मैं तो तुम्हारे चक्कर में था ही। ...वैसे चक्कर कोई अच्छा शब्द नहीं है। मैं तुम्हें प्यार करने लगा था।”

    “तुम और प्यार!... लल्लू थे तुम, याद नहीं वो बात? ”

    “कौन सी बात? ”

    “अरे जब तुम प्रिंसिपल के पास मेरी शिकायत ले कर गये थे और उसके सामने घिघिया रहे थे कि सर मुझे एक लड़की छेड़ती है – सोफ़िया हक़, तो प्रिंसिपल ने क्या जवाब दिया था? ”

    “हां, बेदी सर ज़ोर से हंसे थे और बोले थे, ‘अबे लल्लू, अगर वो छेड़ती है तो तू छिड़। बेवक़ूफ़ तुझे ज़रा भी शर्म नहीं आती कि तू एक लड़की की शिकायत कर रहा है?...  हम इतने बड़े हो गये हैं लेकिन आजतक हमें किसी लड़की ने नहीं छेड़ा। अरे तुम सचमुच बीसवीं सदी के लड़के हो या विक्टोरियन एज के बचे हुए नमूने हो?”
 
“तुम को एक बात बताऊं, तुम हमेशा बहुत शरीफ़ लगा करते थे।... तुम्हारी पगड़ी इतनी स्टाइलिश बंधी होती थी कि मैं तो फ़िदा ही हो गई थी।”

    “वैसे एक बात बताओ, अगर मैं झेंपू किस्म की चीज़ नहीं होता तो क्या होता। हमारी दोस्ती कहां तक पहुंच जाती? ”

    “अरे वो माथुर याद है?.. जो वो कहता था, बस वही हो जाता। ... मैं पेट फुलाए स्कूल में आती कि अवतार जी ने मेरे पेट में नया अवतार लिया है! हा हा हा हा... वैसे क्या तुम्हारा कभी जी नहीं चाहा कि आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लो ?”

    “जी चाहने से क्या होता है ? हिम्मत भी तो होनी चाहिये। मुझ में तुम्हारे वाली हिम्मत ही कहां थी ?... तुम्हें वो उषा याद है क्या ? ”

    “कौन सी उषा ? ”

    “वही जो स्कूल के बाहर ही रहती थी। आर्ट्स में थी। वो मुकेश का गाना गाया करती थी, जियेंगे मगर मुस्कुरा न सकेंगे, कि अब ज़िन्दगी में मुहब्ब्त नहीं है। ” 

    “हां जी, उस रोंदड़ को कौन भूल सकता है। बोलती थी तो लगता था कि अब रोई के तब रोई।...उसने छ : साल तक बस वो एक ही गाना सुना सुना कर बोर कर दिया।....वैसे अवतार, गाती ठीक थी, ...मुझे मुस्कुराए हुए तो एक ज़माना ही बीत गया है।”


    “जानती हो उसने एक दिन मुझे कहा था कि अवतार तुम कोई माडर्न नाम रख लो न ! आई विल कॉल यू ऐवी ! अवतार बहुत पुराना सा नाम लगता है। तुम में जो सेक्स अपील है, नाम भी वैसा ही होना चाहिये।... उसके बाद उसने मुझे हमेशा ऐवी कह कर ही बुलाया।.. मुझे पता ही नहीं चलता था कि मुझे बुला रही है।... वैसे रोंदड़ नहीं थी यार। अच्छी भली लड़की थी।.. सांवली भी थी। मुझे गोरे रंग के मुकाबले हमेशा सांवला रंग ज़्यादा अट्रेक्ट करता है।”

    “मैने भी नोट किया था कि तुमने यह बात स्कूल में दो तीन बार दोहराई थी। तुम्हें अपर्णा सेन बहुत सुन्दर लगती थी।... गोरी चिट्टी हिरोइनें नहीं।.. फिर इंगलैण्ड में क्या करते हो ?.. किसी गोरी मेम से चक्कर नहीं चला क्या ? ”

    “अरे हमारा क्या चक्कर चलना, एक शादी की थी, वो भी संभाली नहीं गई।... फिर से कंवारा बना बैठा हूं। ”

    “हां अशोक बख़्शी और नरेश मिले थे। दोनों ने बताया कि तुम उनसे कांटेक्ट रखते हो। उन्होंने ही बताया कि तुम्हारा डिवोर्स हो गया या समथिंग लाईक दैट। ”

    “हां बख़्शी और नरेश तो अब भी मिलते हैं। लेकिन बाकी की क्लास से तो कट ही गया। .. तुम मेरी छोड़ो, अपनी बताओ। तुम्हारे जावेद मियां का क्या हुआ ? ”

    “होना क्या था यार, बस शक्की दिमाग़ का आदमी था। मेरी गोद में दो लड़कियां डाल कर कहीं भाग गया। आजकल एक प्राईवेट नौकरी कर रही हूं। साला गुज़ारा तक ठीक से नहीं हो पाता। मैने अपनी बड़ी वाली की तो शादी भी कर दी थी। लेकिन उसकी किस्मत मेरे से भी ज़्यादा ख़राब निकली। ”

    “अरे तुम्हारी बेटी की भी शादी हो गई ? ”

    “शादी भी और विधवा भी। ... अब क्या बताऊं तुम्हें।”

    “यार यह सुन कर तो लगने लगा है कि मैं भी बूढ़ा होता जा रहा हूं। क्या हम इतने बड़े हो गये हैं कि हमारे बच्चों की शादियां होने लगें? अपने यार को तो यह एक्सपीरियेंस कभी हुआ ही नहीं। ”

    “अवतार मियां तुम भूल रहे हो कि मेरी शादी हायर सेकेण्डरी पास करते ही हो गई थी। अभी तो अट्ठारह की भी नहीं हुई थी।... जब शादी होगी, तो सुहागरात भी होगी।.. और जब वो होती है तो पेट फूल ही जाता है। दो बार फूला और दो बार हवा निकलवा दी। वर्ना चार चार को ले कर बैठी होती। हमारे मर्द भी तो जाहिल होते हैं। उनके लिये औरत बस इसी काम के लिये होती है। हर साल एक बच्चा बाहर निकाल लो।...बेग़ैरत होते हैं सब। ”

    “आई एम सॉरी सोफ़ी ! मुझे कुछ भी नहीं पता था।.. वैसे तुम बोलती आज भी उतना ही बिन्दास हो।...  ”

    “जानते हो कितना जी चाहता था कि मुझे कोई सोफ़ी कह कर लिपटा ले अपने साथ। आज पहली बार किसी मर्द ने मुझे यह कह कर बुलाया है। लगता है अचानक नई नवेली दुल्हन बन गई हूं। काश मैं भी कॉलेज और यूनिवर्सिटी जा पाती। मुझ में भी थोड़ी नफ़ासत आ जाती। मुझे तो नौकरी भी वैसी ही मिली हुई है जैसी किसी हायर सेकेण्डरी पास टाइपिस्ट को मिल सकती है। बस टाइपिंग सीख ली थी जो काम आ रही है। ” 

    “काम क्या करता था जावेद ? ”

    “जमादार था नामुराद। निकम्मा एक नंबर का बाप के सिर पर खा रहा था और मुझे भी खिला रहा था। वो भागा तो उसके बाप ने मुझे और बच्चियों को भी निकाल बाहर किया। .. वैसे तो मैं तुम्हें कभी भूली ही नहीं थी... पर उन दिनों तुम्हारी बहुत याद आयी। तुम हिन्दू लोग अपने परिवार को कितना प्यार करते हो। ”

    “नहीं सोफ़ी ऐसी कोई बात नहीं। अच्छे लोग अच्छे ही होते हैं। चाहे वो हिन्दू हों या फिर मुसलमान या ईसाई।... वैसे थोड़ी देर पहले तुमने मुझे सिख कहा था ! .... अब देखो मेरी पत्नी मुझे छोड़ कर अनवर के साथ चली गई। उसे कोई मुसलमान पसन्द आ गया। मैनें सुना है अब तो दोनों के दो बच्चे भी हैं। ”

    “या अल्लाह, तुम कैसे मर्द हो जी। अपनी बीवी को जाने दिया ? दो झापड़ नहीं लगाए उसे ? ”

    “सोफ़ी घर बनता है प्यार से, विश्वास से। झापड़ से घर टूटते हैं बनते नहीं। ”

    “एक बात बताओ। ”

    “पूछो। ”

    “तुम हिन्दू लोग क्या अपनी पूरी तन्ख़ाह अपनी बीवी को दे देते हो? .... क्या घर का खर्चा वो चलाती है ?  हमारे पड़ोस में दो तीन पहचान वाली हैं। जब वो बात करती हैं तो जलन सी होती है। वो अपने मरद के बारे में कितने हक से बात करती हैं। हमारे मरद तो गिन गिन कर पैसे निकालते हैं दांत के नीचे से।”

    “मैं औरों की बात तो नहीं कह सकता सोफ़ी, लेकिन हमारे अपने घर में तो सारा खर्चा पहले दादी चलाती थी फिर मां और यहां लंदन में पिंकी। हमें लगता है कि हम कमा कर थक जाते हैं, इसलिये खर्चे का हिसाब बीवी को करने देते हैं।.. बीवी घर की मालकिन जो होती है। ”

    “अल्लाह करे कि हमारे मरद भी तुम लोगों की तरह सोचने लगें। यहां तो मामला एकदम उलट ही होता है। ”

    “......”

    “........”

    “कुछ बोलो न, तुम चुप क्यों हो गये ? ”

    “नहीं कुछ नहीं, बस स्कूल के दिनों की बातें याद आ रही थीं।...याद है हमने स्कूल में पहली हड़ताल करवाई थी ? ”

    “मियां हमने मत कहिये। वो हड़ताल तो पूरी तरह से आपके दिमाग़ की उपज थी। और हड़ताल करवा कर ख़ुद मेरठ भाग गये।...डरपोक कहीं के ! ”

    “ऐसी बात नहीं है सोफ़ी, तीन दिन तक तो हम सब इकट्ठे तालकटोरा गार्डन में नारे लगा रहे थे। पहली बार प्रिंसिपल सर से बात करने भी तो मैं ही गया था। वो तो मेरी नानी अचानक हस्पताल में भर्ती हो गई थी। इसलिये मुझे जाना पड़ा। मगर वापिस आकर सारा ज़िम्मा तो मैने अपने सिर ले लिया था। ”

    “लेकिन मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आ रहा था उन दिनों। तुम चाह रहे थे कि हायर सेकेण्डरी के इम्तहान से पहले प्रिपरेटरी लीव मिले और मैं चाह रही थी कि आख़री दिन तक स्कूल चले। इस तरह तुम से आख़री दिन तक मिल सकती थी। ”

    “मैनें इस ऐंगल से कभी सोचा ही नहीं। मैं तो बस लीडर बना हुआ था। फिर माथुर और खन्ना ने मुझे बांस के झाड़ पर चढ़ा दिया था। मुझे भी लगने लगा था कि मैं कोई लीडर बन गया हूं।... अब सोचता हूं तो हंसी आती है। ”

    “तुम प्रिंसिपल के चहेते थे, इसलिये बच भी गये, वर्ना वो छोड़ता नहीं। ”

    “वैसे अपनी फ़ेयरवेल याद है क्या ? ”

    “अरे उसे कौन भूलना चाहेगा। तुम्हारे साथ लिया गया ज़िन्दगी का एक अकेला चुम्बन। मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि दाढ़ी वाले चेहरे पर किस कहां करूं।... ज़बरदस्त करंट लगा था। तुम तो कुछ कर ही नहीं रहे थे। अगर मैं न हिम्मत करती तो यह यादगार पल भी हमारी ज़िन्दगी में कभी न आ पाता।”

    “इसीलिये तो मैं भी तुम्हें कभी नहीं भूल पाया। तुम वो पहली लड़की हो जिसको छूकर मुझे पता चला था कि औरत मर्द से कितनी अलग होती है। दोनों के मिलने से क्या फ़ीलिंग होती है।”

    “और अब कितने तरह की कितनी औरतें तुम्हारे जीवन में आ चुकी हैं ? ”

    घबरा सा गया अवतार। वैसे उसे सोफ़िया से ऐसे प्रश्न की आशा तो होनी ही चाहिये थी, “अरे कहां सोफ़ी,     हमारी ज़िन्दगी में कहां ऐसी बहार है। एक थी वो भी छोड़ कर चली गई। ”

    “घबराइये मत, इन्शाअल्लाह जल्दी ही बहारें लौट भी आयेंगी।... तुम्हारा कोई बच्चा नहीं हुआ पहली बीवी से ? ”

    “अरे पहली क्या और आख़री क्या। हमारी ले दे कर एक ही तो बीवी हुई। अभी बच्चे के बारे में सोचा ही नहीं था कि बीवी डोली में बैठ कर पराए घर चली गई।... सुनो, दो दो बच्चों के साथ तुम्हें मुश्किल तो बहुत होती होगी।... बेटी इतनी कम उम्र में विधवा कैसे हो गयी ? ”

    “क्या बताऊं दोस्त, अल्लाह की मर्ज़ी के आगे किस का ज़ोर चलता है। जल्दबाज़ी में बेटी की शादी कर दी। अपनी अम्मी की रिश्तेदारी में ही की थी। लड़का श्रीनगर में नौकरी करता था। सोचा कि लड़की को दिल्ली से दूर भेज दूं ताकि मनहूस बाप का साया भी न पड़ सके उसकी ज़िन्दगी पर। लेकिन क्या बताऊं... ! ”
“बोलो न, क्या हुआ फिर ? ”

    “वो लड़का तो आतंकवादी निकल गया। किसी गिरोह के साथ मिल कर दहश्तग़र्दी का काम करता था। एक दिन पुलिस के साथ मुठभेड़ हो गई, और गोली लगी उसके दो कानों के ठीक बीच। वहीं सड़क पर ही ढेर हो गया। अभी तो बेटी को यह भी नहीं पता चला था कि शादी का मतलब क्या होता है, और बेचारी बेवा भी हो गई। तीन महीने ही तो रही अपने ससुराल। पुलिस की दरिंदग़ी से बचाने के लिये मैं उसे वापिस दिल्ली ले आई। अब तो सब अल्लाह पर नज़रें टिकी हैं।”

    “सोफ़ी अगर मैं कोई मदद कर सकूं तो कहो। तुम्हारी बेटी मेरी भी तो कुछ लगती है। उसका दुःख मेरा भी तो दुःख है। ”

    “अरे अब तुम्हें ही तो सब करना है। मैं तो थक सी गयी हूं। ” आंसू सोफ़िया के शब्दों के साथ टेलिफ़ोन से बाहर आये जा रहे थे। 

    रोते रोते सोफ़िया ने टेलिफ़ोन बन्द कर दिया। अवतार हेलो हेलो ही करता रह गया।

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    अब सोफ़िया ने अवतार के दिल-ओ-दिमाग़ पर कब्ज़ा बना लिया था। शाम को शराब के गिलास में जब पानी डाला तो लगा कि सोफ़िया के बदन पर होली का रंग डाल रहा है। कुछ नहीं में सब कुछ दिखाई देने लगा था। 

    दिमाग़ में बहुत से सवाल कुलबुलाने लगे। -  “आख़िर सोफ़िया मुझ से चाहती क्या है ? ... क्या मुझ से विवाह करना चाहती है ... ताकि मैं उसकी बेटी की ज़िम्मेदारी उठा लूं ? क्या मुझे इस लफ़ड़े में पड़ना चाहिये ? ... इतने वर्षों में न जाने सोफ़िया कैसी औरत बन गयी होगी ? ...उसका दामाद तो आतंकवादी था। कहीं... वो और उसकी बेटी भी ?.. यह क्या बेहूदा बातें सोचना लगा है ? ... लेकिन... फिर इतने लम्बे समय के बाद अचानक उसे मेरी याद क्यों आई।... बात यही होगी ... वर्ना ऐसे ही थोड़े मुझे फ़ोन किया है ! ”

    कुछ नहीं के पैग की मात्रा में आज अतिरिक्त वृद्दि हो गई थी। तीन के बाद भी रुक नहीं पा रहा । अवतार लगातार पीता जा रहा है। आज पिंकी उसके सिस्टम में से निकल कर कहीं दूर चली गयी है जबकि अनवर का चेहरा धुंधला होता जा रहा है – बस एक ही चेहरा आंखों के सामने है, किन्तु वो चेहरा भी क्या सचमुच का चेहरा है ? जो आवाज़ आज टेलिफ़ोन लाईन पर सुनाई दी थी, उसका चेहरा तो स्कूल की यूनिफ़ॉर्म पहने सोफ़िया का था। आज का चेहरा कहां है ?

    रात बिना कपड़े बदले ही बिस्तर पर लुड़क गया था। साईड टेबल पर शराब का गिलास अभी भी आधा भरा पड़ा था। भारी सिर लिये सुबह उठा। लगभग घिसटता हुआ बाथरूम तक गया। सोफ़िया ने उसकी सपाट ज़िन्दगी में अचानक हलचल मचा दी थी। उसकी बेटी के भविष्य के बारे में चिन्ता होने लगी थी। अगर धर्म आड़े न आ गये होते तो शायद यह लड़की उसकी अपनी बेटी होती।... सोच बेलगाम हो कर दौड़े जा रही थी। 

    फ़ोन की घन्टी फिर बजी।.... आज दुविधा बढ़ गयी थी। फ़ोन उठाये या नहीं ? कहीं सोफ़िया का न हो। ... अभी निर्णय ले ही नहीं पाया था कि फ़ोन की आंसरिंग मशीन शुरू हो गयी।... किसी ने कोई संदेश नहीं छोड़ा।         ... बस सोच रहा है.. किसका फ़ोन हो सकता है? क्या यह ठीक रहेगा कि वह सोफ़िया के फ़ोन की प्रतीक्षा करता रहे। सोफ़िया तो रोते रोते फ़ोन बन्द कर गयी। क्या यह उसका कर्तव्य नहीं बनता कि वह स्वयं आगे बढ़ कर सोफ़िया को फ़ोन करे और उसके आंसू पौंछ दे।

    पूरी चौबीस घन्टे बीत गये हैं।... अपने आपको  संयत करने का प्रयास कर रहा है अवतार। तय नहीं कर पा रहा है कि सोफ़िया के प्रति कैसा रवैया अपनाए। न जाने सोफ़िया इतने लम्बे अर्से में किस किस तरह के लोगों से मुलाक़ात करती रही है। .. फिर एक गन्दी सी सोच दिल में आती है... साले मुसलमान मेरी बीवी को ले गये हैं, मैं भी किसी मुसलमान लड़की के साथ घर बसा लूं तो हिसाब बराबर हो जायेगा। फिर अपने आपको ही डाट लगाता है। कितनी घटिया बात सोचने लगा है! आज नहीं तो कभी तो प्यार किया था सोफ़िया से। अवतार तो बेगानों के बारे में ऐसी बातें नहीं सोचता, तो फिर ..... ? फिर तय करता है। ठीक है, मैं पहले फ़ोन नहीं करूंगा।     लेकिन यदि सोफ़िया करेगी तो उसको प्रोपोज़ कर दूंगा। 

    टेलिफ़ोन लाईन में फिर हलचल हुई। घन्टी बजी। अपनी चिर-परिचित आवाज़ में बोला, “ हां जी ? ”

    “वाह जी, लंदन में रहके भी हांजी कहने की आदत अभी भी चल रही है! मान गये भई।”

    “तुम फ़ोन रखो, मैं करता हूं।”

    “कोई बात नहीं अवतार, आज तो कार्ड ख़रीद रखा है।”

    “कोई बात नहीं, कभी इमरजेन्सी में काम आ जायेगा। अभी फ़ोन रखो, मैं करता हूं।”

    सोफ़िया ने फ़ोन नीचे रखने से पहले कह ही दिया, “मेरे सरदारा, तू है बड़ा प्यारा ! ”

    अब मुश्किल अवतार की थी, फ़ोन मिलाते हुए उंगलियां कांप रही थीं, दिल धड़क रहा था। फिर भी फ़ोन तो मिलाना ही था। फ़ोन मिला, “हां, बोलिये।”

    “कल हम क्या बात कर रहे थे ? ”

    “तुम कह रही थीं कि सब कुछ मुझे ही करना है। लेकिन तुमने बताया नहीं कि करना क्या है।”

    “बस मेरी पगली बेटी के लिये कुछ कर दो।”

    “लेकिन अगर मैं तुम्हारे लिये कुछ करना चाहूं तो?”

    “अब मेरी ऐसी उम्र कहां रह गयी अवतार। अब तो अपने बच्चों के लिये जी रहे हैं।”

    “हम अपने लिये कभी भी जी पायेंगे क्या?”

    “देखो अवतार अब हालात बहुत ख़राब हो चुके हैं। तुम मेरी बेटी के बारे में सीरियसली सोचो।”

    “तुम बताओ, क्या चाहती हो तुम?”

    “देखो अगर उसको किसी तरह लंदन बुलवा सको और वहां सैटल करवा सको तो उस बिन बाप की बेटी की ज़िन्दगी बन जाएगी।.. वैसे निगोड़ी है तो बी.ए. सैकण्ड ईयर पास। पूरी करने से पहले ही उसका निकाह जो हो गया था। ”

    “बात तो तुम्हारी ठीक है पर यहां ब्रिटेन में आजकल कानून बहुत मुश्किल हो गये हैं। या तो लड़की प्रोफ़ेशनल हो ऊंची पढ़ाई वाली या फिर किसी से शादी करके यहां सैटल हो सकती है। मैं अपने पहचान वालों से बात करके देखता हूं अगर कोई शादी के लिये लड़का मिल जाए तो... ”

    “....”

    “...”

    “हैलो सोफ़ी, क्या तुम लाईन पर हो ? हैलो... ! ”

    “हां अवतार, सुन रही हूं।... तुम मेरी बात सुनो... तुम मेरे दोस्त हो... तुम तो मुझ से प्यार भी करते थे.... तुम आजकल हो भी अकेले...भला तुम... तुम ख़ुद ही मेरी बेटी से शादी क्यों नहीं कर लेते? तुम्हारा घर भी बस जायेगा और मेरी बेटी की ज़िन्दगी भी सैटल हो जायेगी।... तुम सुन रहे हो..... ”

    अवतार को लगा जैसे टेलिफ़ोन लाईन में बहुत घरघर्राहट सी पैदा हो गई है। उसे सोफ़ी की आवाज़ बिल्कुल सुनाई नहीं दे रही। उसने टेलिफ़ोन बंद कर दिया।
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फ़िर भी दिल है हिन्दुस्तानी

, by शब्दांकन संपादक

    16 जनवरी की शाम एक खूबसूरत शाम थी,  इसे खूबसूरत बनाया सुश्री ज़किया ज़ुबेरी जी , श्री तेजेंद्र शर्मा जी और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने और चार चाँद लगाया श्री राजेन्द्र यादव की उपस्थिति ने .
    हालाँकि तबीयत अचानक ख़राब होने के कारण जाने न जाने पर असमंजस बना हुआ था ,पर इस बात ने कि वो लोग इंग्लैंड से यहाँ आ रहे हैं और हम अगर गाज़ियाबाद से भी दिल्ली न गए तो ये अच्छी बात नहीं होगी ,हमने जाने का मन बनाया और ईश्वर की कृपा हुई और तबीयत में भी कुछ सुधार हो गया ,पहुंचे तो साहित्य अकादमी के तृतीय तल के हाल के बाहर ही श्री तेजेंद्र शर्मा जी ने गर्मजोशी से स्वागत किया,  दिल खुश हो गया.
    अल्पाहार के बाद श्रोताओं से भरे सभागार में कार्यक्रम प्रारंभ हुआ ,श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी जी ने सुश्री ज़किया ज़ुबेरी जी का जीवन परिचय दिया उसके पश्चात् सुश्री ज़किया ज़ुबेरी जी ने एक ह्रदय स्पर्शी कहानी `मन की सांकल` का सुन्दर पाठ किया , ज़किया जी की कहानियाँ, पहली पीढ़ी के अप्रवासी भारतीयों का जीवन और दर्द बखूबी बयां करती हैं, उसके पश्चात ,तेजेंद्र शर्मा जी ने सुश्री ज़किया ज़ुबेरी जी की एक अन्य अच्छी कहानी `मारिया` का पाठ किया,  सुनने वाले कहानी सुनने के साथ कहानी देख भी रहे थे ऐसा अनुभव हुआ कयूँकि तेजेंद्र शर्मा जी ने आरोह, अवरोह तथा अन्य सम्वादानुकूल ढंग से कहानी के शब्दों को प्रस्तुत किया.
    कहानियों के बाद सुश्री ज़किया ज़ुबेरी जी व श्री तेजेंद्र शर्मा जी ने श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए.
    कहानियों पर श्री राजेंद्र यादव,  श्री असगर वजाहत, श्री दिविक रमेश , सुश्री शशि शर्मा , श्री रहमान मुसव्विर , सुश्री वंदना पुष्पेन्द्र, नित्यानंद तुषार,(कवि एवं संपादक `युग वंशिका`) , श्री विनोद सेठ आदि ने अपने विचार व्यक्त किये .
    इसी कार्यक्रम में सुश्री ज़किया ज़ुबेरी जी के भाई श्री फिज़ा आज़मी की एक काव्य  पुस्तक `तुम्हारे दुःख, हमारे ग़म` का भी विमोचन श्री राजेन्द्र यादव ,प्रसिद्ध कथाकार एवं संपादक हंस ने किया.
    कार्यक्रम में अकादमी के सचिव श्री के .एस राव भी उपस्थित थे, इसके अलावा श्री ओम थानवी (संपादक - जनसत्ता),   प्रेम भारद्वाज (संपादक पाखी) , दिविक रमेश, प्रेम जनमेजय,   सुश्री सुमति, सुश्री सरिता शर्मा , वंदना यादव, रूपा सिंह, प्रेम सहजवाला, प्रदीप सौरभ,  विवेक मिश्र,सुभाष चंदर ,भरत तिवारी, कनक चतुर्वेदी, शशि शर्मा , आनंद कुमार, सुनिधि शर्मा, विनीता शर्मा, बिपिन शर्मा ,  श्री उपेन्द्र राय, व अनेक गण्यमान्य लेखक, साहित्यकार आदि उपस्थित थे.


                               फोटो एल्बम                             
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कवितायें- तू, शीशमहल, सूखे पत्ते - डॉ. रश्मि

, by शब्दांकन संपादक

सूखे पत्ते

हरे-हरे पत्ते
जिनसे सजती है टहनियाँ
फिर ये ही पत्ते
सूखकर टूटकर बिखर जाते हैं
टूटे पत्तों का गिरना धरा पर
है मात्र एक प्रक्रिया
या षडयंत्र रचती हैं टहनियां
इन सूखे निर्जीव पत्तों से
नहीं चाहती दिखना वे बेजान
फिर ये तोड़े जाते हैं ,अलग किये जाते है
या किंचित
लाचार पत्ते स्वयं ही अलग हो जाते हैं
क्योंकि अब ये कोमल नहीं
सूखने लगे हैं इनके किनारे
और ये मुरझाए से वृद्ध पत्ते
बोझ बन गए है युवा टहनियों पर
बदरंग कर रहे है इन टहनियों को
टहनियां भी कहाँ कभी मानतीं हैं अपना दोष
वे भी कब तक झेलती इन्हें
मौसम की तरह उन्हें भी बदलना है
टहनियों की ही तरह शक्ति-संपन्न लोग
नकार देते है उन्हें जो नि:शक्त है, विपन्न हैं
सूखे पत्तों की तरह......

तू

तेरी निगाहों में मैं क्या-क्या ढूंढती हूं,
अपनी ही ज़मी अपना आसमां ढूंढती हूं।
जब तू मेरे पास होता है तो यह एहसास होता है,
मैं तुझमें समा रही हूं तुझसे ही आ रही हूं।
फिर न कुछ पल बाकी होता है, न याद बाकी होती है,
न कोई ख्याल बाकी होता है, न बात बाकी होती है।
बस तू ही साथ होता है एक तू ही पास होता है,
बंद आंखों में भी तेरा ही दीदार होता है।
बंद आंखों से तुझे मैं घंटों निहारती हूं,
तेरी हर आहट-हर आवाज़ को दिल में उतारती हूं।
आंख खुलते ही तू दूर चला जाता है,
पर तेरी सूरत, हर बात साथ होती है।
तेरे साथ बीती हर याद साथ होती है,
तू अब भी मेरे पास है अब भी मेरे साथ है, ऐसा गुमान होता है।
फिर खुद को भूलकर तेरी यादों में खो जाती हूं,
आंख मूंद कर तेरी निगाहों में सो जाती हूं, उनमें ही खो जाती हूं।
न जाने फिर तेरी निगाहों में मैं क्या-क्या ढूंढती हूं,
अपनी ही ज़मीं अपना आसमान ढूंढती हूं।


शीशमहल

मेरे रिश्ते
पारदर्शी थे
काँच की तरह
बहुत चमकीले
सब कुछ साफ़, बेदाग़
सब उजला नज़र आता था उनमें
नाज़ था उन चमकीले रिश्तों पर मुझे भी
बाहर से देखने वालों को भी
वह शीशमहल नज़र आता था
हर रिश्ता आईना था
सभी के सीने में
एक दूसरे का अक्स था
पर भूल बैठी मैं
वह मेरा
शीशे का एक घरौंदा था
एक तूफ़ान और धराशाई वो शीशमहल था
जिसके सामने आते ही
मुझे मेरा अक्स नज़र आता था
वह चटक चुका था
और मुझे ही
'बहुरूपिया' दिखा रहा था
कल तक जो शीशमहल था
आज कांच का नश्तर था
मैं भूल गई थी कि
कांच के रिश्ते टूटने पर
नश्तर बन जाते हैं
हँसें तो, आईना
टूटें तो,चुभन बन जाते हैं
मेरा वो शीशमहल बिखर गया था
हर रिश्ता
एक टुकड़े में बँट गया था
क्योंकि
मेरा घर काँच का था
उसमें भी कभी
सब चमकीला और साफ़-साफ़ था



डॉ . रश्मि  | शिक्षा - 'कबीर काव्य का भाषा शास्त्रीय अध्ययन' विषय में पी-एच .डी . |कार्य - लेखन व शिक्षण | अमर उजाला, दैनिक भास्कर, कादम्बिनी, पाखी, हंस, दैनिक ट्रिब्यून आदि सभी के साथ लघुकथाओं, कविताओं व पुस्तक्समीक्षा के लिए संबद्ध ... 







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तेजेन्द्र शर्मा को मिला हरियाणा साहित्य अकादमी सम्मान

, by शब्दांकन संपादक

    नई दिल्ली 17 जनवरी। हरियाणा साहित्य अकादमी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए सूचना दी है कि अकादमी का अगला विशेष साहित्य सेवी सम्मान ब्रिटेन के हिंदी कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा को उनके हिंदी साहित्य एवं भाषा के लिए उनकी सेवाओं के लिए प्रदान किया जाएगा।

 ज़किया ज़ुबैरी (ब्रिटेन की प्रमुख कथाकार  काउंसलर) का कहानी पाठ सुनते तेजेन्द्र शर्मा, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली  | फोटो: भरत तिवारी
सम्मान के तहत 51,000 रूपए की धनराशी शामिल है।
    तेजेन्द्र शर्मा के अब तक सात कहानी संग्रह काला सागर, ढिबरी टाइट, देह की कीमत, ये क्या हो गया, सीधी रेखा की परतें, कब्र का मुनाफा, दीवार एं रास्ता प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कहानिओं एवं गजलों की ऑडियो सी डी  भी जारी हो चुकी हैं।


 
    New Delhi, 17 January. Haryana Sahitya Academy in its press release informed that Hindi writer from London, Britain Tejendra Sharma would be honored with the Vishesh Hindi Sahitya Sewak Samman in the coming month. The award carries a shield and a cash amount of Rs.51,000/-.
    Mr. Tejendra Sharma is the writer of Kaala Sagar, Dhibri Tight, Deh ki Keemat, Ye kya ho gaya, Seedhi Rekha ki Partein, Qabra ka Munafa, Deewar mein Raasta (All collections of short stories). Audio CDs of his stories and ghazals have also been released.
[] शब्दांकन [] Shabdankan
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कहानी : प्रेम भारद्वाज : था मैं नहीं (भाग 2)

, by शब्दांकन संपादक

इस कहानी के तमाम पात्र वास्तविक है। इनका कल्पना से कोई लेना‒देना नहीं है। अगर कोई इस कहानी में कोई खुद को ढूंढ ले तो वह संयोग नहीं होगा। : प्रेम भारद्वाज


‘फि़र क्या सोचूं’

    ‘यही कि हम मंदी की महामारी के शिकार हो बेरोजगार हो गए हैं। नौकरी छुट गयी‒ नई मिल नहीं रही। छह महीने हो गए, क्या करें? ...कहां जाएं ...?

‘क्या करे?’

    ‘इस सवाल का जवाब तेरे सेकेंड खोपड़ी में तो आने से रहा ...मुझे ही अपनी शातिर दिमाग से कोई रास्ता, कोई आईडिया निकालना होगा, चिंता मत कर‒ मैं सोचता हूं।’


    दोनों मिल कर सोचने लगे। सोचने के क्रम में पीने की रफ्तार बढ़ गई। कमरे में रखे बहुत पुराने टीवी में न्यूज चैनल लगा है। खबरे आ रही हैं। सहसा एक समाचार ने प्रवीण के कान खड़े कर दिए। उसने टीवी की ओर चेहरा घूमाया ...आवाज तेज की। प्रभाकर समझ नहीं पाया कि प्रवीण को अचानक ये हो क्या गया? उसकी दिलचस्पी न्यूज में कैसे हो गयी। उसने भी देखा। ब्रेकिंग न्यूज में रेल मंत्री घोषणा कर रही हैं रेल दुर्घटना में मरे ड्राइवर ... ।

‘‘मिल गया’’ उछल गया प्रवीण।

‘क्या ...।’

‘आईडिया’

‘किस चीज का’

‘नौकरी पाने का’

‘लेकिन बैठे‒बैठे, बिना मेहनत, वो भी शराब पीते हुए मिल गया ...कमाल है भाई’

    ‘टाइम बदल गया है घोंचू‒ अब मेहनत से कुछ नहीं मिलता‒ रोटी मिलती है वो भी बिना दाल के, सूखी‒ अच्छी चीजें तो ऐसे ही शराब पीते हुए हासिल होती हैं ...तभी तो बड़े लोग शराब पीते हैं और देश‒दुनिया चलाते हैं।’

‘सिर्फ़ तूझे ही क्यों मिली यार ...शराब तो मैं भी पी रहा हूं।’

    ‘तू केवल शराब पी रहा है सोच नहीं रहा ...चिंतन नहीं कर रहा। मैं पीने के साथ‒साथ चिंतन भी कर रहा हूं बड़े लोगों और खुशवंत सिंह जैसे नामी लेखकों की तरह‒’

‘तू शराब पीकर लेखक बन गया?’

‘नहीं,मेरा दिमाग क्रियटिव हो गया है ...मैंने कुछ खोजा है ...’

‘क्या’

‘मंदी के दौर में एक अदद सरकारी नौकरी’

‘लेकिन नौकरी है कहां?’

‘एक कदम दूर ...’

    प्रभाकर उठकर खड़ा हो गया। वह बंद दरवाजे की ओर देखा। अगल बगल नजरें दौड़ायी। कहीं कुछ भी नहीं दिखाई दिया उसे।

‘दोस्त ...कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा’

उसके इस प्रश्न में पूरी तरह से मासूमियत थी

‘दरअसल, नौकरी नैतिकता के गहरे धुंध में छिपी है, हमें उस धुंध को किसी भी तरह हटाना होगा।’

‘वो कैसे?’

‘रोशनी कर के ...’

‘नहीं अंधेरा बढ़ाकर ...’ प्रवीण के दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था।
पेज़ ३



‘तुमने धुंध कुछ ज्यादा बढ़ा दी ...सीधे शब्दों में बताओ नौकरी कैसे मिलेगी?’

‘हत्या करनी होगी।’

‘नौकरी के लिए हत्या‒’ प्रभाकर आश्चर्य में पूछा।

‘नौकरी नहीं, नैतिकता के धुंध को हटाने के लिए हत्या।’

‘क्या यह जायज होगा‒’

    ‘विकासवाद के सिद्धांत सिद्धांत के अनुसार इस दुनिया में जो सक्षम है, वही सरवाईव करेगा‒कभी‒कभी खुद को जीवित रखने के लिए कुछ अप्रिय कदम भी उठाने पड़ते हैं उसमें मेरी समझ से कुछ बुरा नहीं है।‒’

‘मामला अप्रिय का नहीं, हत्या का है ...किसी के जीवन का अंत।’

    ‘हर जीवन का अंत तय है‒जंगल में कई जीव खुद को जीवित रखने के लिए दूसरे जीव को मारते है‒यह एक चक्र है‒काल‒चक्र’

‘वो जंगल का जीवन है‒जंगलीपन है‒’

     ‘आज हम जिस दौर में पहुंच गए हैं वो जंगल और जंगलीपन से ज्यादा भयावह है‒जंगल के दरख्त भले ही सिमटकर बालकनी के गमलों में आ गए है‒सभ्यता का विकास भी हुआ है‒ मगर मन के भीतर का जंगलीपन कबिलाई युग का है‒’
‘हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं‒’

    ‘यह सिर्फ़ तकनीकी और तिथिगत मामला है‒इतिहास का एक पड़ाव है‒मोटी बात यह है कि वो चाहे कबिलाई युग हो या इक्कीसवीं सदी‒ हमें इस दुनिया में जीने का अधिकार है‒कैसे भी’

‘खुद के जीने के लिए दूसरे के जीवन का अंत’

‘विध्वंस के बाद ही निर्माण होता है‒ ...’

‘हत्या किसकी करनी होगी?’

‘हत्या नहीं, हत्याएं ... हम दोनों अपने‒अपने पिताओं की हत्या करेंगे और उसे एक दुर्घटना का रूप देंगे।’

    ‘साले, तू पागल हो गया है‒’ गुस्से में प्रभाकर ने प्रवीन का कालर पकड़ लिया‒ ‘या फि़र शराब ने तेरा दिमाग खराब कर दिया है’

    गुस्से में गिलास में बची शराब को प्रभाकर ने प्रवीण के चेहरे पर फ़ेंक दिया।


    प्रवीण ने कोई प्रतिकार नहीं किया। वह शांत रहा। मौन। चेहरे पर चिर शांति का भाव। वह कुरुक्षेत्र में खड़े महा‒भारतकालीन कृष्ण की तरह मंद‒मंद मुस्कराते हुए उपदेश देने के अंदाज में बोला‒‘गीता में कृष्ण ने कहा है‒ इस पृथ्वी पर अपना पराया कोई नहीं‒रिश्तों की माया है। हम सब मनुष्य मात्र है। जीत अगर अपनों की लाश से गुजर कर मिलती हो तो यह पुण्य‒पथ है। यही महाभारत का सच था‒आज भारत में भी है। हमारी जीत हमारी नौकरी है‒ समझे वत्स, यही इस दौर का सच है। जीना है अपने लिए। कैसे भी।’

प्रवीण समझता तो क्या?
पेज़ ४


 दृश्य‒तीन 
रमेश आज सुबह उठते ही परेशान हो गया‒ रात को सपने में पिता आए थे। वहीं उदास चेहरा। कुछ लोगों का जीवन उदासी के वृत्त से बाहर नहीं निकल पाता। पिता उन्हीं कुछ लोगों में शुमार थे। हैं नहीं, थे। मर चुके हैं। मर कर भी उदासी। इसी उदासी से मुक्ति के लिए तो उन्होंने मौत का वरण किया था। बगैर इस बात की परवाह किये कि उनके पीछे छुट गए उन लोगों का क्या होगा जिसे परिवार कहते हैं‒ पत्नी, बच्चे, मां, बहन।

    रमेश अपने पिता को उस नायकत्व वाले नजरिये से नहीं देखता जैसा कि आमतौर पर भारतीय पुत्र देखने के आदी होते हैं। उसके पिता आदर्श न कल थे, न आज हैं। हो भी नहीं सकते। उसकी नजरों में वे एक कायर और खुदगर्ज इंसान रहे।

    वह अक्सर सोचता है‒ उसके पिता की खुदकुशी, क्या खुदगर्जी का ही नया नाम नहीं है। एक नया रूप। खुद को खत्म करने का स्वार्थ से भरा फ़ैसला। विषम स्थितियों से घबड़ाकर उससे मुक्ति का एक भ्रम भरा रास्ता ......।
वह दो साल बाद भी अपने पिता को माफ़ नहीं कर सका है‒ कर भी नहीं पाएगा।

     दो साल पहले पिता ने आत्महत्या कर लिया था। किसान थे। हर साल सूखा पड़ता जा रहा था। काश्तकार से कर्ज लिया‒ सोचा तो यही होगा कि अगले साल अच्छी फ़सल होने पर कर्ज चुका देंगे। सूखा अगले साल, और उसके अगले साल भी जारी रहा। कर्ज बढ़ता गया। हजारों का कर्ज लाखों में पहुंच गया। काश्तकार का दबाव बढ़ता जा रहा था। एक रात पिता नहीं लौटे। हमने उन्हें ढूंढा। वो नहीं मिले। अगली सुबह खेत में उनकी लाश मिली। उस खेत में जिसकी छाती फ़ाड़कर वो सालों‒फ़सल उगाते रहे थे। पता नहीं पिता ने मरने की जगह घर के बजाय खेत को ही क्यों चुना? क्या कोई संदेश देना चाहते थे‒रमेश आज तक नहीं समझ सका है।

     पर रमेश जरा भी दुखी नहीं हुआ था। अलबत्ता गुस्सा आया था। मन में नफ़रत उमड़ पड़ा था। कोई व्यक्ति इतना कायर भी हो सकता है‒ इससे तो बेहतर होता कि वो कर्ज का तगादा करने वाले काश्तकार का गला काट देते‒इस देश के प्रधानमंत्री की हत्या कर देते। उस मंदिर को ध्वस्त कर देते जिसमें स्थापित देवता की मूर्ति पर उन्हें अटूट भरोसा था।
रमेश ने खेत बेचकर कर्ज चुकाया। होरी से गोबर बन गया। उस खेत का क्या काम जो जीवन को पालने ही बजाय उसका अंत करने लगे‒ उस पर गेहूं‒धान की जगह मौत की फ़सल लहराए। उसके गांव के अधिकतर युवाओं ने शहर की ओर रूख किया। किसानी में जान देने की आत्मघाती रास्ते पर न चलकर, शहर जाकर मजदूर बनना स्वीकारा। वह भी मजदूर बनने शहर चला आया।

     को छोड़ते वक्त आंखों में जीवन को बेहतर बनाने का सपना था। तब इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि शहर में नौकरी पाना कितना कठिन है। गांव से विदा के वक्त मां के आंसुओं को पोछते वक्त भरोसा दिलाया था‒ ‘मत रो मां‒मैं कब्रिस्तान को छोड़कर जीवन की तलाश में जा रहा हूं ...इस गांव में मौत है। अपनी बारी का इंतजार नहीं करना है मुझे ...पिता की तरह कायर नहीं हूं ...मरने की स्थितियों में भी मैं कईयों को मार कर ही मरूंगा‒ मुझे खुद के लिए जीना है‒।’

    मां रमेश की ऊंची‒ऊंची बातों को सुनते हुए भी जैसे नहीं सुन रही थी। वो बस एक ही बात जानती थी‒पहले पति ने हमेशा के लिए साथ छोड़ा। अब इकलौता बेटा भी दूर जा रहा है। उसे अकेला छोड़कर। बोली कुछ नहीं। आंसुओं के बहने की रफ्तार तेज हो गयी।

    शहर में आए रमेश को महीना से ज्यादा हो गया। अभी तक नौकरी नहीं मिली। लेकिन आज सपने में पिता क्यों आए? उसने तो पिता के संबंध में सोचना ही छोड़ दिया। आए भी तो उसी मनहूसियत वाले अंदाज में‒उदासी का खंडहर बनी सपने में भी भाषण पिला गए‒ बेटा, जीवन में संवेदना बहुत जरूरी है‒।
झल्ला गया वह। जिस संवेदना ने उनके लिए आत्महत्या का मार्ग प्रशस्त किया। उससे मरकर भी पीछा नहीं छुटा। और हसरत है कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी आईस वर्ग से टकरा चुकी संवेदना की टाईटैनिक में सवारी करे जिसका समंदर में डूबना तय है। नहीं करनी उसे संवेदना के टाईटैनिक की सवारी। वह स्वार्थ की डेंगी से ही खुद को किनारे पहुंचाएगा।
पिता की बेकार की यादों को झटक कर वह ग्यारह बजे एक कंपनी के दफ्तर पहुंचा जहां मात्र एक ही पद रिक्त था‒ इसके बारे में आज के ही अखबार में विज्ञापन पढ़ा था उसने।


    वह सीधे मैनेजर से मिला‒ ‘‘सर, आपके यहां सुपरवाइजर की जगह है। ये है मेरा बायोडाटा।’’‒

‘सॉरी‒’ मैनेजर ने उसका बायोडाटा लेने से मना कर दिया‒।

‘क्यों, क्या हुआ?’

‘ये जो बगल में बैठे हैं कि मि. पटेल इनको हमने अप्वाइंट कर लिया‒ आप थोड़े लेट हो गए‒’

‘थैंक्स‒’ वह निराश हो गया। वह जब मैनेजर के केबिन से निकला तो दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था‒
पेज़ ५



 दृश्य‒चार 

‘हां तो साक्षी जी, मैं एक करोड़ के लिए अंतिम सवाल पूछता हूं‒आप तैयार तो हैं’

‘जी‒बिल्कुल।’

    ‘एक करोड़ का सवाल। बहुत बड़ी राशि होती है यह। ये रुपये आपका जीवन बदल सकते हैं‒ क्या करेंगी इन रुपयों का‒’

    ‘कई प्लान हैं‒ मकान, गाड़ी, लक्ज़िरिय्स लाइफ़ ...पहले मिडिल क्लास की घुटनदार माहौल से निकलें तो‒’ साक्षी की आंखों में सपना तैर रहा था‒शानदार जीवन का सपना।

    ‘मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है‒ आप एक करोड़ रुपये यहां से लेकर जाएं। बाकी की जिंदगी मौज‒मस्ती से काटें‒हां, तो एक करोड़ का प्रश्न है कि ये जो सामने आपका बेटा अमन है‒ वो क्या कुछ सचमुच ही आपके पति से है या आपके किसी प्रेमी के साथ जिस्मानी रिश्तों का नतीजा है।’



     बिजली के 440 वोल्ट का झटका लगा साक्षी को। हिल उठी वह। अप्रत्याशित प्रश्न। लेकिन इसे अप्रत्याशित भी नहीं कहा जा सकता। पति वेदांत समेत तमाम रिश्तेदारों का चेहरा फ़क्क। बेटा अमन इतना समझदार हो गया है कि जिस्मानी रिश्तों का अर्थ समझ सके। वह विस्फ़ारित नजरों से अपनी मां साक्षी को देखने लगा। इसका जवाब जो सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी के वजूद से जुड़ा है और जो उसके जीवन में अब जलजला ला सकता है। सच भी क्या ऐसे होते हैं? पर्दे के पीछे के सच? क्या सच का सामना ऐसा होता है? क्या रिश्तों की इमारत इस किस्म के सच की नींव पर खड़ी होती है? मासूम अमन सवालों के सर्प से लिपटता चला गया।

    टीवी पर इस बेहद चर्चित धारावाहिक को देख रहे लाखों दर्शक की नजरें साक्षी पर टिकी थी। उन्हें उसके जवाब का इंतजार है। उत्सुकता चरम पर। एक अलग किस्म का थ्रिल। रोमांच। साक्षी, अमन वेदांत के दिमाग में क्या चल रहा था, इसे केवल वहीं जानते‒समझते थे।

    ‘सोचिए साक्षी जी‒ खूब सोचिए‒सवाल एक करोड़ का है‒ लाइफ़ बदल जाएगी। जीने का स्टाइल बदल जाएगा। इतने पैसे तो आपने कभी देखे भी नहीं होंगे। बेशक इस सवाल का जवाब रिश्तों का समीकरण गड़बड़ा सकता है‒ कुछ लोग आपकी आलोचना भी करेंगे। लेकिन लोगों का काम है कहना। समय बदल गया है‒आज के जमाने में पैसा ही सब कुछ है। वह प्रतिष्ठा दिलाता है‒रिश्तेदारों को फ़ेविकोल के जोड़ की तरह चिपकाए रखता हैं। सोचिये, हिम्मत कीजिए। एक जवाब, एक करोड़। आगे की लाइफ़ चकमक‒चकमक। गलत जवाब से फि़र वही मिडिल क्लास का दलदल। न पैसा, न प्रतिष्ठा। केवल टेंशन। मरी हुई इच्छाओं के ढेर पर वही पुरानी जिंदगी। लाइफ़ में ऐसा चांस बहुत कम मिलता है साक्षी जी‒ अवसर आपके आगे बाहें फ़ैलाए खड़ा है। बस, उठकर आपको उसे गले लगाना है।’
पेज़ ६


 दृश्य‒पांच 


     रेलवे केबिन के सामने पटरी पर दो लाशे पड़ी हैं। रात का वक्त। सूनसान इलाका। ये लाशें प्रभाकर और प्रवीण के पिताओं की है। अनुशंसा पर नौकरी पाने के लिए यह जरूरी था कि उनके पिता ड्यूटी के दौरान मारे जाएं। वहां से जाने के पूर्व दोनों केबिन के बाहर पटरी पर लाशों को देखते हैं। स्वार्थ के लहू में लथपथ रिश्तों की लाश।

    ‘हमने अच्छा नहीं किया प्रवीण‒ नौकरी पाने के लिए पिता की हत्या।’

    ‘हम किसी की हत्या करने वाले कौन होते हैं वत्स‒?’ प्रवीण का अंदाज फि़र वही गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण सरीखा था‒’ ईश्वर की मर्जी के बगैर इस सृष्टि में कोई पत्ता भी नहीं हिलता‒ जो कुछ अभी यहां घटित हुआ उसमें ऊपर वाले की मर्जी है। हम तो एक माध्यम भर है‒।

    ‘तेरे चक्कर में मैं भी मारा जाऊंगा‒’

    ‘हमें मरना नहीं, मारना है, जीतना है‒महाभारत जीतने के लिए लाखों लोग मारे गये‒भाई ने भाई को मारा, शिष्य ने गुरु की हत्या की। गीता में कृष्ण ने संदेश दिया था‒ माया‒मोह त्याग कर युध करते हुए जीत हासिल करो।‒’

    ‘पिता को मारकर जीत‒’

    ‘यह एक महज इत्तफ़ेाक है कि वो हमारे पिता थे‒ यह भी संयोग है कि उनका अंत हमारे हाथों हुआ। वैसे देह नष्ट होता है आत्मा अजर अमर है। हमें पूरी उम्मीद है और हमारी प्रार्थना भी कि हमारे इन जन्मदाताओं की आत्मा को कोई भी कोई शानो‒शौकत वाला अगला जन्म मिले‒ नए देह में नया जीवन। गहरी अंधेरी रात के बाद सुबह की तरह। हमने इनको लाइन मैन की बोरिंग नौकरी से मुक्त कर दिया। पच्चीस साल से ट्रैक बदलते रहे। ट्रेनों को सही रास्ते पर डालते रहे कि वो मंजिल तक पहुंच सके‒ खुद की जिंदगी का ट्रैक नहीं बदल सके‒नहीं पा सके मंजिल‒’

    ‘मुझे घबराहट हो रही प्रवीण‒ तेरे उपदेश को सुनने के बाद भी।’

    ‘चल दारू पीते हैं, सारी घबराहट दूर हो जाएगी‒। रोना तो है ही कल सुबह इन लाशों से लिपटकर, जैसे हमारा सबकुछ लूट गया हो‒’

    ‘तू इमोशनलेस हो गया है‒’

    ‘जीने की राह यहीं से होकर गुजरती है‒ भावनाओं को स्वार्थ के रथ से रौंदकर ही महाभारत का युध लड़ा गया। लाखों लाशें बिछाई गई। वह सब कुछ सत्य के लिए नहीं हुआ था‒सत्ता के लिए किया गया था जो स्वार्थ का ही दूसरा नाम है। वह चाहे सत्ता हो या स्वार्थ‒क्रूर ही होता है।’

     प्रवीण ने जेब से पौव्वा निकाला। दो घूंट खुद पीने के बाद बोतल प्रभाकर की ओर बढ़ा दिया। वह गुनगुनाने लगा‒मुझको यारों माफ़ करना,‒मैं नशे में हूं।
पेज़ ७



 दृश्य‒छह 

    रमेश पूरी शक्ति के साथ दौड़ रहा है। आज वह लेट नहीं होगा‒किसी भी सूरत में नहीं। वह उस ऑफि़स की ओर दौड़ रहा था जहां कुछ दिन पहले उसे नौकरी यह कहकर नहीं मिली थी कि वह लेट हो गया‒ उसकी जगह पटेल को नौकरी दे दी गयी।

    कुछ ही पल बाद वह मैनेजर के केबिन में धड़धड़ता हुआ दाखिल हुआ। वहां एक महिला बेहद उदास बैठी थी। मैनेजर समझ नहीं पाया कि इस आमदी को हुआ क्या है? इसमें पहले कि मैनेजर कोई सख्त टिप्पणी करता, रमेश ने हाफ़ंते‒हाफ़ंते कहा‒ सर, आज मैं लेट नहीं हूं‒ मुझे वो नौकरी दे दीजिए जो कुछ दिन पहले आपने पटेल को दी थी‒ पटेल की एक दुर्घटना में मौत हो गई है‒ मैं उसकी लाश देखकर भागा‒भागा आया हूं।’

    ‘वो नौकरी तुम्हें नहीं मिल सकती’

    ‘क्यों’



    ‘मि. पटेल को नौकरी से निकाल दिया गया था‒ दरअसल उस पोस्ट को ही मंदी के दौर में खत्म कर दिया गया है शायद नौकरी जाने के गम में ही उसने आत्महत्या कर ली होगी।’

    दुर्घटनाग्रस्त पटेल‒पिता की उदासी, खेत में पड़ा उनका शव‒ मां के आंसू, एक‒एक कर सब रमेश की आंखों के सामने आने लगे।
पेज़ ८



 दृश्य‒सात 

    ‘दुविधा‒ द्वंद्व‒भय‒रिश्तों का शीरजा बिखरने का डर। वह डर जो आदमी को सच बोलने से रोकता है‒बहुत ज्यादा सयम ले रही हैं साक्षी जी‒’

     ही ऐसा है‒’

     का संबंध सच से है‒सच तो सच ही होता है‒मैं एक बार फि़र सवाल दोहराता हूं। आपका बेटा अमन क्या आपके किसी प्रेमी के साथ जिस्मानी रिश्तों का नतीजा तो नहीं।’

     मेरे पति से ही है’ मन को मजबूत कर जवाब दिया साक्षी ने।

     के पिता आपके पति यानी वेदांत जी का ही है‒ चलिए, इन पोलीग्राफ़ जी से पूछते हैं कि क्या यह सही जवाब है‒’
‘यह गलत जवाब है‒’ पोलीग्राफ़ की टिप्पणी।

    साक्षी ने अपना माथा पीट लिया। वहां मौजूद रिश्तेदारों में सबसे बुरी स्थिति अमन की थी? उसके वजूद पर सवालिया निशान लग गया। मां ने झूठ बोला। सच यह है कि वो एक नाजायज औलाद है‒। मां के विवाहेत्तर जिस्मानी रिश्तों का नतीजा। अमन की आंखे नम हो गईं। उसने टीवी पर महाभारत देखा था। कर्ण का चेहरा उसे याद आया। साक्षी का चेहरा अचानक कुंती में तब्दील हो गया। अगर उसके पास दो करोड़ रुपये होते तो वह अपनी मां से अगला सवाल पूछता‒ ‘अब एक और‒सच बोल दीजिए मम्मी जी बदले में दो करोड़ दूंगा। मेरा असली पिता कौन है?’
पेज़ ९



    और अंत में

    ये थीं कुछ असल जिंदगियां ...कुछ हादसे ...कहानी की शक्ल लिए हकीकत की कुछ बदरंग सूरतें। महाभारत नहीं वर्तमान इंडिया के कुछ पात्र है। ऊपर लिखी गई कहानी में तमाम पात्र वास्तविक हैं जिनके बारे में मेरे दोस्त ने बताया।
कहानी के तमाम पात्र मेरे दोस्त के साथ ही जेल में बंद थे‒ एक ही वार्ड में। सब पर हत्या का आरोप। इन हत्यारों में मेरा दोस्त कौन था, इसे राज रहने दीजिए।

    क्या हर घटना के लिए वजह अनिवार्य तत्व है? क्या जो जीवन हम जीते हैं वह किसी कारण से होता है? बहुत कुछ यूं ही‒ बेसबब नहीं होता। लेकिन दूसरी तरफ़ कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि इस जीवन में कुछ भी अकारण नहीं होता। रियल्टी शो में जाने से पहले वेदांत और साक्षी में एक सहमति बनी थी कि वो एक करोड़ हासिल करने के लिए केवल सच ही बोलेगी‒ चाहे वो सच वेदांत के लिए कितना भी क्यों न कष्टप्रद हो। वह बुरा नहीं मानेगा। मंदी के दौर में नौकरी गंवा चुके वेदांत को एक करोड़ चाहिए था‒ एनीहाऊ, एंड एनी कंडीशन। तय हुआ था वेदांत साक्षी के देह‒संबंधों के सच को भी सहन कर जाएगा। साक्षी को तब नहीं मालूम था वो एक करोड़ रुपया हासिल करने के वास्ते पति की योजना का एक माध्यम बनने जा रही है। शोषण का नया तरीका। लेकिन इसका क्या किया जाए कि न साक्षी अंतिम सच बोलने का साहस दिखा पायी, न उस सच का सामना वेदांत ही कर पाया। न सनम मिला, न विसाले यार।

पेज़ १०

    न जाने मुझे यह क्यों लगता है कि इस कहानी के जो पात्र हत्या कर जेल पहुंचे है वो एक निमित्त मात्र है‒एक माध्यम, एक यंत्र है, महाभारतकालीन पात्र जो स्वार्थ और सत्ता में लिपटे अपने स्वार्थ के लिए लड़ रहे हैं। ये असली अपराधी नहीं है ...जेल में जो पात्र पहुंचे है उनके भीतर अंधायुग उतर आया ...उन्होंने किसी मर्यादा‒नैतिकता का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि उनकी अपनी कोई मर्यादा थी ही नहीं। वो तो शतरंज पर बिछे मोहरे भर हैं। चाल तो कोई और चल रहा है। वास्तविक अपराधी कोई और है जो जेल से बाहर है ...तय जानिए वह कृष्ण के ‘गीता’ की कोई नियति या ईश्वरीय‒सत्ता नहीं। वह हमारे बीच का कोई व्यक्ति अथवा सत्ता है। उसे ढूंढना होगा‒आप उसे ढूंढे ...मैं भी उनकी खोज में हूं। अगर आपको पहले मिल जाएं तो मुझे सूचित करें‒
                                       
प्रेम भारद्वाज
बी‒82, प्रथम तल
जीडी कालोनी
मयूर विहार फ़ेज – 3
दिल्ली‒96
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