राष्ट्र भक्ति का भभूत - डॉ. रमेश यादव की कविताएँ

, by शब्दांकन संपादक

मुझे कवि से बचाओ !


एक दिन
आम आदमी चिल्लाया
बोला
हमें कविता से नहीं
कवि से बचाओ

हमने आश्चर्य से पूछा
क्यों भाई
आपको
कवि से क्या ख़तरा
आम आदमी ने कहा
तुम भी कवि हो क्या
हमने कहा
नहीं
मैं पाठक हूँ
फिर
उसकी आवाज़ आयी

हमें पढ़ो
कवि की कविता और
भावना में
हमारे
दर्द, पीड़ा और कसक की
अभिव्यक्ति

मैं कवि का
कच्चा माल हूँ
हमारे ही संवेदनाओं और संभावनाओं को
देता है
वह आकार
पकाता, गढ़ता और रचता है
शिल्प का संसार

हमारे ही जीवन संघर्ष को
बनाता है
‘शब्दों‘ का संग्रह

ले जाता है
वैश्विक बाज़ार में
जहाँ सजी होती है
कविता की मंडी

हमारे दुखों पर चढ़ाकर
रस, छंद, अलंकार, मुहावरा, लक्षणा-व्यंजना
और लोकोक्तियों की परत

जहाँ मिलते हैं
रंग-बिरंगे मुखौटा लगाये
समीक्षक /आलोचक
और खरीदार
दुकान लगाये पुरस्कारों की

बिचौलिए संचालित करते हैं
गढ़ों और मठों को
क्षेत्र, जाति, धर्म
और संप्रदाय की टोपी पहने

कवि
जीतने में कामयाब होता है
‘कविता‘ का पुरस्कार
देखते-देखते
भर जाती है
उसकी झोली
रुपयों, पदों, सम्मानों
और अवसरों से

हमारे भविष्य के चिन्तक
बना लेते हैं
अपने भविष्य की उज्जवल ईमारत
हम बन जाते है
उनकी नींव

हम जहाँ थे
सदियों पहले
आज भी पड़े हुए हैं
वहीँ पर

हम ठहरे
अनपढ़
गंवार
पढ़ते नहीं हैं
हम कविता
हम तो जीते हैं
कविता में उद्घाटित जीवन को

कविता में मौजूद है
हमारे जीवन संघर्ष का अंश
हमारे जड़ों तक नहीं पहुंचा है
कोई कवि
वह कल्पनाओं से खेलता और रचता है
हम जीते हैं यथार्थ को

21 वीं सदी में भी हम
किसी का
‘होरी‘
और
‘झुनिया‘ हैं

आम आदमी चिल्लाया
हमें बचाओ

शब्दों के इन जादूगरों से
हमारे दर्दों के सौदागरों
और भावना के बिचौलियों से

हम खुद लड़ेंगे
अपनी मुक्ति की लड़ाई
सुबह होने तक

     आदमी और गेहूँ


     एकांत में बैठ
     सोच रहा कि
     आदमी और गेहूँ
     के जीवन में
     कितनी समानतायें हैं
     बचपन में मेड़ पर बैठकर
     पिता को हल जोतते हुए
     एकटक देखता
     आगे-आगे बैल चलते
     पीछे-पीछे पिता
     और उनके पीछे
     माँ
     कुरुई में गेहूँ लिए
     हल से बने
     कोंड़ में गिराती जातीं
     अंत में हेंगा
     दिया जाता
     गेहूँ खेत में
     दफ़न हो जाता
     सोचता हूँ
     गेहूँ खेत में बोया जाता है
     और
     आदमी समाज में
     दोनों का पालन-पोषण
     देख-रेख कितनी
     लगन, भावना, उम्मीदों
     उत्साह से की जाती है
     लोग गेहूँ से पेट भरने
     आदमी से पेट
     पालने की उम्मीद रखते हैं
     गेहूँ को किसान-मजदूर
     सींचता है और
     खाद-गोबर देता है
     आदमी जब
     शिशु होता है
     उसकी भी तो परवरिश
     गेहूँ की तरह ही तो करते हैं
     माँ-पिता
     गेहूँ के लहलहाती बालियों को देख
     प्रफुल्लित होता है किसान
     ठीक वैसे ही
     जवान होते बच्चे को देख
     भाव-विभोर होते हैं
     माँ-बाप
     दोनों का सतह से उठने का
     जीवन संघर्ष भी
     एक ही तरह का है
     गेहूँ
     जमीन को फाड़कर ऊपर उठता है
     और
     आदमी
     मनुवादी जड़ता को
     गेहूँ की तरह ही फाड़ता है
     सामाजिक-सांस्कृतिक गैर-बराबरी
     के खिलाफ़ जन्म से संघर्ष करता है
     आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए जूझता है
     राजनैतिक भागीदारी के लिए लड़ता है
     आदमी और गेहूँ का
     जमीन और मिट्टी से
     कितना परस्पर सम्बन्ध है
     गेहूँ का अस्तित्व मिट्टी से है
     और आदमी का
     जाहिर है समाज से
     गेहूँ जमीन में पैदा होता है
     और पेट में हजम
     आदमी पेट से पैदा होता है
     लेकिन ताज़िन्दगी जमीन पर रहता है
     गेहूँ भूखों को
     जीवनदान देता है
     और आदमी
     कभी-कभी
     जमीन के लिए
     आदमी की जान भी ले लेता है
     फिर
     एक सवाल
     आदमी बड़ा या गेहूँ ...?

बेलचा


उनके निपटे हुए
शब्दों को
पद्म भूषण/विभूषण
साहित्य अकादमियों
के ‘बेलचे’ से राष्ट्रीय सम्मान सहित
उठाया जा रहा है
लेकिन
जिनके
दर्द
पीड़ा
और
जीवन संघर्ष
को वे शब्दों में
निपटे थे
वे लोग आज भी वैसे ही हैं
जैसे
सैकड़ों सालों से हैं...

     मैं ‘गण’ हूँ ‘तंत्र’ से दबा


     मैं
     गण हूँ
     तंत्र से दबा
     कुचला
     घायल
     कराहता हुआ
     बूट से दबाया गया
     कभी बंदूकें हमारे सीने पर राज़ कीं
     बैलट से ठगा गया
     बूथ पर घायल पाया गया
     वादों से छला गया
     उम्मीदों पर परखा गया
     धर्म की भट्ठी पर चढ़ाया गया
     कभी जातियों में दर-ब-दर
     किया गया
     अगड़ों में बंटा
     पिछड़ों में छंटा
     दलित के नाम पर दुरदुराया गया
     जो था आदिवासी
     ना बना अब तक निवासी
     कभी अल्पसंख्यक बन
     अल्पाहार
     का निवाला बनाया गया
     कभी पूर्वोत्तर का दर्द तो
     कश्मीर की पीड़ा
     मैं
     'गण' 'तंत्र' हूँ
     गगनचुंबी है
     अपना गान
     मगर
     गगन ही अपना ठांव

मैं उत्तर नहीं,निरुत्तर हूँ


मैं उत्तर हूँ
सवाल नहीं
इसीलिए तो
गवाह हूँ
उत्तर प्रदेश का
यही मेरा उत्तर समझो
हमको सबने लूटा
अलग–अलग वक़्त में
रंग-बिरंगे झंडे लगाकर
सबसे अधिक कांग्रेसियों ने लूटा
भाजपाई भी पीछे न रहे
सपाईयों ने अवसर न खोया
बसपाईयों ने इतिहास दोहराया
जिसको मौका मिला
उसने लूटा
अगड़ों ने सबको लूटा
गुलामी के वक़्त राजा बन लूटा
आज़ादी के बाद सत्ता में घूस के लूटा
पार्टी-झंडा बदल-बदलकर
आदिवासियों,
दलितों,
पिछड़ों
अल्पसंख्यकों के
रहनुमा भी पीछे न रहे
ये तो अपनों को लूटे
जिनका सपना चकनाचूर हुआ
मैं उत्तर हूँ
सवाल नहीं
इसीलिए तो
निरुत्तर हूँ

नज़र शिकारवादी, ज़िगर पूंजीवादी


          व्यवहार में उदारवादी हैं
          विचार से सामंतवादी हैं
          लगता है समाजवादी हैं
          मगर पक्का जातिवादी हैं

          समय चाहे जैसा हो
          घोषणा करते साम्यवादी हैं
          नज़र से शिकारवादी हैं
          ज़िगर पूंजीवादी है
          मन साम्राज्यवादी है
          कहते जनवादी हैं

          जीवन सुखवादी है
          कहते संघर्षवादी हैं
          सोच भोगवादी है
          कहते लोकवादी हैं

          लिखते क्रांतिकारी हैं
          बोलते जुगाड़वादी हैं
          सक्रिय अवसरवादी हैं
          कहते सर्वहारावादी हैं

          चाल सरकारवादी है
          ढाल मनुवादी है
          अपन भी कहाँ फंसे
          समाज परिवर्तनवादी है

विरोध और भोग


बुद्धिमान
बुद्धिजीवी हैं
हमेशा भाप की तरह भभकते हैं
जुगाड़ू 
सभी माध्यमों के मंच पर
सक्रिय दिखते हैं
जब भी मुँह खोलते हैं
विरोध करते हैं साम्राज्यवाद का
लोगों को लगता है
बाबा
राष्ट्रवादी हैं
रैडिकल क्रांतिकारी हैं
मगर असली जीवन में
बाबा अंतरराष्ट्रीय
भोगवादी हैं
करते हैं सरकारी नीतियों का विरोध
लगाते हैं सुविधाओं का भोग

     राष्ट्र भक्ति का भभूत

     फरिश्ता बनकर 
     यूँ ना फिराकर
     तेरी फरेबी का राज़ जग पे जाहिर है
     तिरंगे में छुपाकर
     अपने चेहरे को

     यूँ ही न मुल्क को ठगाकर
     हमें दुपट्टे आंचल
     और तिरंगे का
     रंग-ए-फर्क मालूम है
     हमसे रंगों से यूँ ही न
     खेलाकर
     देखें हैं
     हमने बहुत तुझसे राष्ट्र भक्त
     लगा ‘भभूत’ माथे पर
     ‘राष्ट्र भक्ति’ की
     यूँ ही न हमें
     भरमाया कर
     फरिश्ता बनकर 
     यूँ ना फिराकर

डॉ. रमेश यादव (पीएचडी)
सहायक प्राध्यापक
पत्रकारिता एवं नव मीडिया अध्ययन विद्यापीठ
(School of Journalism and New Media Studies)
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU)
 http://www.shabdankan.com/2012/12/drramesh000.html







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तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे - मणिका मोहिनी

, by शब्दांकन संपादक

तो यह उसने आखिरी पत्ता फेंका है, कि उम्र से उसे कोई ऐतराज़ नहीं, कि उसके बड़ी होने से उसे कोई परहेज़ नहीं, परहेज़ है उसमें उम्र के हिसाब की गंभीरता न होने से. क्या इतनी बड़ी होने पर भी वह चंचलता और जीवन्तता से भरपूर है, इसलिए ?

उसका पत्र पा कर वह दंग रह गई. यह तो कमाल ही हो गया. उसका जीवन्तता और गर्माहट से भरा होना उसे नागवार गुज़रा है. बुझी हुई, बेजान होती तो उसे रास आती शायद. ऐसा प्यार करने वाला न देखा, न सुना.

प्यार करने वाला नहीं, प्यार करके प्यार को धिक्कारने वाला.

उसने कई बार महसूस किया था कि उसके प्यार में कुछ ठंडापन आ रहा है धीरे-धीरे,एक ठहराव. वह जब भी मिलता है, कुछ बुझा-बुझा सा रहता है. उसने कई बार कई तरह के कारण बताए. मसलन कभी...... रात वह ठीक से सो नहीं पाया. कभी...... उसकी तबीयत ठीक नहीं है. कभी...... उसे कई काम करने हैं. आदि आदि. उसका पूछना बंद नहीं हुआ पर उसके कारण शायद ख़त्म होने लगे तो उसने कहना शुरू किया, ' कम्प्लेंट रजिस्टर ला कर रख दूंगा. उसमें रोज़ शिकायत दर्ज करती रहना. बहुत शिकायत करती है तू.'

हाँ, वह उसे ' तू ' कह कर ही बुलाता था. शुरू में उसे अजीब लगा था. कोई भी उसके नाम के आगे ' जी ' लगाना नहीं भूलता. एक दिन उसने पूछ ही लिया, ' मैं बड़ी हूँ तुमसे. तुम मुझे ' तू ' कहते हो ? '

' प्यार करता हूँ तुझसे.'

' फिर भी...... '

' जब मुझे पता चला कि तू मुझसे बड़ी है, इतनी ज्यादा पढ़ी-लिखी है, मैंने तभी सोच लिया था कि अगर मैंने तुझे ' तुम ' या ' आप ' कहा तो तू बस में नहीं आने वाली.'

' ओह्हो, तो यह बात है. मुझे बस में करके तुम्हें क्या करना था ? '

' प्यार, और क्या...... ' तू ' कहने से लगता है, तू मुझसे छोटी है और मैं तुझसे बड़ा.'

प्यार करने के लिए उसने क्या-क्या सोच रखा था. अपने से बड़ी औरत के साथ प्यार करने के लिए पहले वह उसे समान धरातल पर लाएगा, ख्यालों में ही सही, बाद में कुछ और. इसीलिए शायद जैसे-जैसे उसकी साँसों में उसकी उम्र का अहसास घुलने लगा, वैसे-वैसे वह बुझने लगा. धीरे-धीरे उसकी उसमें रूचि कम होने लगी. वह न मिलने, न बात करने के बहाने सोचने लगा.

वह उससे कहती, ' क्या बात है, अब तुम फोन भी नहीं करते ? ' कहती, मतलब एस एम एस करती.

उसका तुरंत जवाब आता, ' सेक्सी बेबी, सब्र कर, काम में लगा हूँ, जल्दी फोन करूंगा.'

तो अब वह उसे ' सेक्सी बेबी ' बुलाने लगा, जैसे उसका मज़ाक उड़ा रहा हो कि देख तू कितनी सेक्सी है, कितनी गन्दी है...... जबकि बात करने में सेक्स का कोई मतलब ही नहीं था.

यूं सेक्स की बात उसी ने की थी, दोस्ती की शुरुआत में ही. वह उसे यहाँ-वहाँ छू-छेड़ रहा था. वह भी तो देखो, उससे मिलने के बाद बच्ची हो गई थी. उम्र की भी लाज-शर्म नहीं रही थी उसे. यूं वह रोमैंटिक और दिलफेंक थी, गज़ब की. उसे कभी-कभी लगता था, उसकी सिर्फ उम्र बढ़ी है, वैसे वह अभी-अभी युवा हुए बच्चों जैसी भावुक है. एक बार उसने उससे भी कहा था, ' लगता है, मेरे भीतर कोई छोटी लड़की छुपी बैठी थी, चुपचाप सोई हुई. तुमने आकर उसे जगा दिया.' यह बात कहते ही उसे खुद लगा था कि प्यार में बहकने के दिन कमउम्र लोगों के नसीब में लिखे होते हैं. उम्रदराज़ लोगों को यह शोभा नहीं देता.

' सच ? '

' सच.'

वो दोनों एक-दूसरे में लिपटे बैठे थे. फिर कैसे क्या हुआ, वह समझ नहीं पाई. उसके मुंह से निकला यह, ' हटो, गंदे कहीं के.'

' इसमें गंदे की क्या बात ? तू मेरी है, मैं तेरा हूँ.'

' तुम्हें शर्म नहीं आएगी ? बड़ी हूँ तुमसे.'

' फिर क्या हुआ ? तुझसे प्यार करता हूँ. इसमें शर्म की क्या बात? आय एम अ टिपिकल मेल, यू नो ? '

' मेरे साथ ऐसे नहीं चलता. छोड़ो...... '

' ऊँ हूँ, प्यार में सेक्स भी होता है.'

' देअर इज अ डिफ़रेंस बिटवीन हैविंग सेक्स एंड मेकिंग लव.'

' तो...... '

' वी विल नौट हैव सेक्स, वी विल मेक लव.'

' ओह, तो कान इधर से नहीं, उधर से पकड़ना है.'

और उन दोनों के बीच जो अनहोना था, वह हुआ. और खूब जम के हुआ. खूब दिल से हुआ. एक बार नहीं, बार-बार हुआ. हर रोज़ हुआ. उफ़ उफ़, उसे छोटा कह कर तो वह ऐसे डर रही थी जैसे वह अछूता अनाड़ी हो.

' तू तो ज़रा भी बड़ी नहीं है. यह तो बस तेरी उम्र कुछ खिसक गई आगे. यार, तू तो अच्छी-अच्छी लड़कियों को मात दे दे,' पहली बार के बाद उसने कहा था, एकदम बाद, जब वह कुछ बोलने की स्थिति में हुआ तो.

दूसरी बार के बाद उसने कहा था, ' हमें एक साथ रहना चाहिए, एक ही घर में, एक ही छत के नीचे, चाहे इसके लिए मुझे तुझसे शादी ही क्यों न करनी पड़े.'

उसके बाद याद नहीं कितनी बारों के बाद वह कहता रहा था, ' जन्मों तक मिलेंगे हम, जनम जनम, हर जनम.'

लेकिन अंतिम बार के बाद उसने यह कहा था, ' सुन, इस जनम में मैं तुझसे पहले मरूंगा ताकि अगले जनम में तुझसे पहले पैदा हो सकूं. और फिर हम मिलेंगे सही उम्र में.'

अच्छा है, वह जन्म-जन्मान्तर में विश्वास रखता है. कम से कम आस तो बंधी रहती है.

उसे तभी समझ लेना चाहिए था कि उम्र की खाई को आसानी से पाटना किसी बड़े से बड़े जिगरे वाले के बस की बात नहीं है. उसने चाहे जो भी कहा हो, असलियत यही है कि उम्र ही है वह असली तत्व जिसने उससे यह लिखवाया है...... यह कि ' उसे ऐतराज़ उसकी उम्र से नहीं, उसमें उम्र के हिसाब की गंभीरता न होने से है.'

उसे इस बात से कोई शिकायत नहीं कि वह उसकी उम्र को नहीं स्वीकार रहा. बल्कि उसे शुरू में शिकायत इस बात से रही कि आखिर उसने उसकी उम्र को स्वीकारा ही कैसे ? वह दो बच्चों की माँ. ठीक है, अकेली है, पति या प्रेमी नाम का कोई जीव-जंतु उसके जीवन में नहीं है. वह स्वतंत्र है किसी से भी प्यार करने के लिए लेकिन...... यह एक बहुत बड़ा लेकिन था उसके छोटा होने के सन्दर्भ में...... उम्र के इतने फासले पर खड़े उससे तो कभी नहीं.

उसने कभी चाहा ही नहीं था कि कोई लड़का या पुरुष उसकी ज़िन्दगी में आए और उससे प्यार करे (या प्यार का नाटक करे). प्यार-व्यार के मामलों से वह कोसों दूर थी. उसे ज़रुरत ही नहीं थी इस सब की. उसके सामने अपने बच्चों की ज़िन्दगी संवारने और उन्हें सही दिशा देने का मुद्दा अहम् था. उसने एक बार सोचा था, उससे मिलने के बाद ही, उसने यदि कोई ऐसा कदम उठाया तो अपने ऐसे लच्छनों से वह अपने बच्चों को क्या संस्कार दे पाएगी ? कौन सी मिसाल कायम करेगी वह ? नहीं, नहीं, उसे कुछ ऐसा नहीं करना जिससे बच्चे उस पर हंसें या उससे नफरत करें. हाँ, कभी लम्बे अरसे तक उसने अकेलापन महसूस किया होता और उसे किसी के साथ की ज़रुरत महसूस हुई होती तो वह अवश्य बच्चों को समझाने और उनका मूड बनाने की कोशिश करती ताकि वे उसकी ज़िन्दगी में आए किसी व्यक्ति को अपना सकते. बच्चे समझदार हैं, समझ सकते हैं पर इसके लिए तो कदापि नहीं. इसका उसे शुरू से कोई भरोसा नहीं लग रहा था कि यह उसके साथ टिक पाएगा, हमेशा के लिए तो दूर, एक लम्बी अवधि के लिए ही चाहे. उसका मानना था, उसका क्या, सभी मानेंगे इस बात को कि कोई भी जवान लड़का इतना मूर्ख नहीं होता कि अपने से बड़ी उम्र की औरत से प्यार करे, वह भी ऐसी जिसके बच्चे भी हों. यदि कोई ऐसा करता है तो इसके पीछे उसका कोई स्वार्थ अवश्य होगा. तर्क-बुद्धि, मनोविज्ञान, शिक्षा, अनुभव, सब इस बात की पुष्टि करते हैं. उसने भी ऐसा ही कुछ सोचा था कि यह जो मुझसे दोस्ती करने के लिए आगे बढ़ रहा है, तो ज़रूर इसके पीछे इसका कोई स्वार्थ होगा.

आज जब उसने लिखा है कि उसमें उम्र की गंभीरता नहीं तो वह उसे याद दिलाना चाहती है कि उसकी उम्र की गंभीरता, शालीनता, आभिजात्य को उसने ही भंग किया है, पहली मुलाकात में ही. वह बहुत ग्रेसफुली अपनी उम्र में आगे बढ़ रही थी. यह सही है कि वे एक-दूसरे को पत्रों के माध्यम से जानने लगे थे. उनके मनों में एक-दूसरे के प्रति प्यार भी जागा था. परन्तु पहली बार मिलने के बाद उसे ऐसा कतई नहीं लगा था कि इस लड़के के साथ कोई रिश्ता संभव होगा. मन ही मन उसे इस बात का अफ़सोस भी हुआ था कि उन दोनों के बीच उम्र का इतना फासला क्यों है ? चिट्ठियों में तो नहीं लगा था. क्या सच में चिट्ठियाँ उसने ही लिखी थीं ? इसकी आवाज़ भी फर्क है. एक बार फोन पर बात हुई थी, तब तो कुछ बड़ा सा लगा था. कितनी अजीब बात है, लगता है, ये तीन अलग-अलग लड़के हैं. एक चिट्ठियों में, दूसरा फोन पर, तीसरा यह.

' आपको कौन सा पसंद है ? '

उसका मन हुआ, कह दे, ' तीनों.' चंचला तो वह है ही. पर उसने कहा यह, ' कोई भी नहीं.'

' कोशिश करता हूँ, कोई एक तो पसंद आए.'

वह कुछ बोली नहीं. उसने मन को समझा लिया. इस लड़के के लिए भटकना ठीक नहीं है. बहुत छोटा है......

कहाँ से छोटा हो गया ? पूरा मर्द है. दुनिया देखा-भाला......

फिर भी......

मरो अब तुम ' फिर भी ' के चक्कर में......

उसने सोचा था, एक साथ कहीं बैठ कर चाय-वाय पिएंगे, कुछ बातें करेंगे औपचारिक, और फिर अपनी-अपनी राह. दुश्वार हो गया उस लड़के को अपनी कार में लिफ्ट देना.

कार में बैठते ही उसने कहा, ' आप बहुत खूबसूरत हैं,' और कहता चला गया, जैसे वारी-वारी जा रहा हो, ' आप बहुत खूबसूरत हैं, सच, आप बहुत खूबसूरत हैं...... '

' बस भी करो, कितनी बार कहोगे ? इतनी भी खूबसूरत नहीं हूँ मैं.'

पर उसे पता था, वह सुन्दर है. उम्र की ढलान पर होने के बावजूद वह सुन्दर है. उसकी देहयष्टि बहुत आकर्षक है. इसके साथ ही बहुत शालीन, कुलीन, गरिमामय, भद्र, अभिजात...... उसका बस चले तो वह खुद अपनी तारीफ़ में विशेषणों के ढेर लगाती चली जाए.

' मैं ड्राइव करूँ ?' वह पूछ रहा था.

' ओ के.' दोनों कार से उतरे और सीट बदल कर फिर बैठ गए.

उसे लग रहा था कि वह भी उसी तरह की मनस्थिति में होगा, जिस तरह की मनस्थिति में वह थी. यानि उम्र के प्रति सजग, सचेत, डरा हुआ. लेकिन यह क्या ? उसने तो उसे तहेदिल से स्वीकार किया. जो जितना कार में हो सकता था, वह सब उसने किया. बहुत प्यार से कह-कह कर किया, ' मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ, तुम्हारे शब्दों ने बांधा है मुझे. मुझे मालूम है, तुम भी मुझसे प्यार करती हो, बस कहने में डर रही हो.' और भी ऐसा ही कुछ, बहुत कुछ. कार में प्यार करने में तो वह बहुत माहिर निकला. लेकिन वह इसके लिए मानसिक रूप से बिलकुल तैयार नहीं थी. उसे उम्मीद नहीं थी, ऐसा कुछ होगा. वह तो उसकी ओर से एक बड़ा नकार सोच रही थी. वह घबरा गई थी, मुफ्त का माल समझा है क्या ? सड़क पर पड़ा हुआ, लावारिस ? अपने साथ एक तरह का बलात्कार हुआ महसूस कर रही थी वह. अब किसे पुकारे ? किससे कुछ कहे ? जो सुनेगा, उसे ही दोष देगा. इस उम्र में इतनी नादान ? दो बच्चों की माँ इतनी नासमझ ? बिना जाने-पहचाने, अभी कुछ देर पहले तो उतरा है वह हवाई जहाज़ से, उसके हाथ में कार की चाबी पकड़ा दी ? सब-कुछ छीन-छान के भाग जाता तो ? कहीं मार डालता तो ?

अब उसका ऐसा पत्र पाकर उसने सोचा, हाय, वह उस दिन उसे मार ही डालता. पास बैठा था, उसका गला घोट देता. कैसे भी उसकी जान ले लेता, लेकिन दिल ही मिला उसे घोटने के लिए? चोट पहुंचाने के लिए ? दिल के सिवा उसे कुछ नज़र नहीं आया, जिस पर वह वार करता ? सच पूछो तो वह एक शरीफ इंसान था. भौतिक वस्तुओं में उसकी कोई रूचि नहीं थी. चोरी-चकारी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह तो सिर्फ दिल चुराने आया था क्योंकि बाद में उसे दिल को ही तो चीर कर रखना था. उसका निशाना सिर्फ उसका दिल था. शरीर तो माध्यम भर था उस दिल तक पहुँचने का. ' लिसेन माय यंगेस्ट लवर, किसी के दिल के साथ खिलवाड़ करने और उसे तोड़ने की सज़ा पाने के लिए जेल नहीं जाना पड़ता क्योंकि यह एक अपराध नहीं होता, यह पाप होता है, जिसकी सज़ा अदालत नहीं, खुदा सुनाता है. तुम सज़ा के पात्र हो. क्या तुम्हे सज़ा इसीलिए न मिले क्योंकि इस खून में मेरी लाश नहीं मिली ? यह दिल का मामला था, मेरे दिल के दुश्मन, दिल की लाशों का हिसाब वह ऊपर वाला रखता है.'


मिलने से पहले उसने एक बार लिखा था, ' मिलने पर अपने मन की सब निकाल लेना. कहीं बाद में अफ़सोस करो, हाय, हमने यह तो किया ही नहीं.' आज उसे अफ़सोस हो रहा था, हाय, हमने यह सब किया ही क्यों ? आज वह यह भी सोच-सोच कर हैरान-परेशान थी, जो लड़का अपने से इतनी बड़ी भद्र महिला के साथ प्रेम निवेदन करने का दुस्साहस करे, प्रेम निवेदन तक ही सीमित न रहे, सोचो, वह कितना बड़ा घाघ होगा. यानि फ्रौड़. यानि बदमाशों का बदमाश. यानि कमीनों का कमीना. फिर भी...... फिर भी...... वह उससे प्यार करने की नादानी कर बैठी. प्यार भी ऐसा-वैसा नहीं, दिल से दिल का प्यार. दिल की गहराइयों में डूब-डूब कर करने वाला प्यार. चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाला प्यार. लगता है, किसी ने कहा है या उसने कहीं पढ़ा है या उसने ही यह कहावत गढ़ी है कि लडकियां इस धरती पर सबसे मूर्ख प्राणी होती हैं. वो बहुत ही दिलफेंक लड़कों की तरफ आकर्षित होती हैं. वो प्यार के लिए उन लड़कों की तरफ भागती हैं जो प्यार के कतई काबिल नहीं होते. दोज़ हू आर नौट वर्थ लविंग. वो हमेशा बंद दरवाज़े क्यों खटखटाती हैं ? ' छैल-छबीले, तूने अपनी छैल-छबीली के दिल की ज़रा कद्र नहीं की.'

बेवक़ूफ़ होने के लिए कोई उम्र तय नहीं होती. आप किसी भी उम्र में बेवक़ूफ़ हो सकते हैं. कहाँ तो वह बलात्कृत महसूस कर रही थी. सोच रही थी, किसको पुकारे, किससे कुछ कहे. कहाँ उससे अलग होते ही वह अकेले में शरमा-शरमा कर, हंस-हंस कर, नाच-नाच कर, झूम-झूम कर उसकी छुवन को अपने शरीर के कोने-कोने में तलाश रही थी. मैं जन्मों की प्यासी हूँ, अब तुम बरसो गरज गरज. वह पागल थी. अनेक पत्र और एक मुलाक़ात उसे पागल बना देने के लिए पर्याप्त थी. वह खुद को शीशे में देख रही थी. खुद पर ही मुग्ध हो रही थी. तो...... तो...... उसने मुझे रिजेक्ट नहीं किया. आय लव यू. आय लव यू. आय लव यू. उसने शीशे पर अपने अधर रख दिए. जैसे खुद को ही चूम रही हो. यह क्या, वह तो सचमुच उससे प्यार करने लगी थी. पगली कहीं की. अपनी उम्र तो देख. और उसकी उम्र देख. अपनी शक्ल तो देख. और उसकी शक्ल देख...... अब आया है ना, इतना बड़ा रिजेक्शन. अब आई है ना इतनी बड़ी धिक्कार, दुत्कार, फटकार.

उसकी पहले दिन की कार्यवाई एकमात्र ज़िम्मेदार थी उसकी आगे आने वाली खुशियों और तकलीफों की. प्रेम में पड़ने के साथ-साथ वह जिद में भी आ गई थी. ' तुझे उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता ना ? तो अब झेल मुझे. मैं तुझे छोडूंगी नहीं, ड्रामेबाज़. अब मैं देखूँगी तुझे कि तू कितने पानी में है. कि कितनी मर्दानगी है तुझ में. कि तू कितना नीचे गिर सकता है. (मैं नहीं गिरी. मेरे गिरने को गिरना नहीं कहा जाएगा क्योंकि मैं तो तुझसे प्यार करने लगी थी.) अब मैं देखूँगी तुझे...... और फिर एक दिन उतारूंगी तेरे चेहरे का मुखौटा. तुझे कहना पड़ेगा कि हाँ, तू मुझसे प्यार नहीं कर रहा था, बल्कि एक ढोंग कर रहा था.' लो, वह दिन आ ही गया. इतनी जल्दी वह अपना मुखौटा उतार फेंकेगा, उसे यकीन नहीं था.

शुरुआत बुरी नहीं थी उनके उस अवांछित, अनपेक्षित सम्बन्ध की, जिसका अंत इस बुरी तरह होना था. उस सम्बन्ध में मधुरता बहुत थी. मानना पड़ेगा, जितने दिन ज़िन्दा रहा, शहद टपकता रहा. जितनी देर वो साथ रहते, खिलखिलाहटें उनके इर्द-गिर्द टहलतीं. वह उसकी ज़िन्दगी में क्या आया, उसकी तो हंसी ही नहीं रूकती थी. वह ही तो सबब था उसकी अगम्भीरता का, उसके बचपने का. अब पूछो कोई उस झल्ले से, जब लड़का-लड़की इस हद तक मिलेंगे कि कोई हद ही न रहे उनके बीच, तो रौनकें छाएंगी या मुर्दनियाँ ?

एक दिन वह उससे बोली थी, अपने बच्चों का हवाला देकर, ' मैं मर जाऊं तो तुम इनका ख्याल रखना. तुम इनके बड़े भाई जैसे हो.'

' मरने की बात मत कर.'

' तुममें कई रिश्ते गडमड हैं.'

' जैसे...... '

' जैसे पुत्र का, जो मैंने अभी कहा...... पिता का, जब तुम रेस्तौरेंट में मुझे बीअर नहीं पीने देते...... भाई का, जब उस दिन हाथ पकड़ कर तुमने मुझे सड़क पार कराई थी...... सखा का, जब उस दिन तुम मेरे घर मेरे फेवरेट पीले रंग की कमीज़ पहन कर आए थे और मैंने भी पीला सूट पहना हुआ था...... पति का, जब तुम खूखार नज़रों से मेरी ओर देखते हो...... प्रेमी का, जैसे तुम रोज़ मुझे अपनी बाहों में बांधे रखते हो...... सहयोगी का...... '

' बस बस, बहुत हो गए, इतने कहाँ संभाल पाऊंगा...... '

उसने अपनी बाहें उसके गले में डाल दी थीं और बोली थी, ' तुम सिर्फ प्रेमी का ही रिश्ता सही से निभा लो, मैं उसी में खुश हूँ.'

' वो तो निभाना ही पड़ेगा. तू गले जो पड़ी है.' उसने उसकी बाहें अपने गले में और कस कर कहा था

फिर वो दोनों एक-दूसरे में गडमड हो गए थे. उस दिन बीअर दोनों ने साथ बैठ कर पी थी. सीडी प्लेअर पर मेंहंदी हसन लगाया था. मोहब्बत करने वाले कम न होंगे. तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे. उसने बीअर के हल्क़े-फुल्क़े खुमार में बार-बार उसके गले में बाहें डाली थीं और बार-बार खुद भी गाया था, ' सच कहती हूँ, तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे. तेरी महफ़िल में लेकिन मैं न होंगी. लेकिन, मेरी महफ़िल में तुम हमेशा होंगे. मोहब्बत करने वाले तुम ही होंगे.'

उस चुलबुली को बहकने के सिवा और आता ही क्या था. उम्र बढ़ रही थी और चुलबुलापन जा ही नहीं रहा था. आखिर खो ही दिया ना उस मनहूस को.

' हाय राम ! अब मैं क्या करूँ ? ' वह रुआंसी थी.

' अब तू माला जप. उसके नाम की नहीं, भगवान् के नाम की. ताकि वह तुझे सद्बुद्धि दे और तू अपने से छोटे लड़के की तरफ ध्यान देना बंद करे.'

' यह कौन बोला ? '

' अपने भीतर झाँक.'

' ओह ! जय जय शिव शंकर. काँटा लगे न कंकर...... '

आज सचमुच में वह महफ़िल उजड़ने का दिन आ गया था. उसका पत्र उस एक लाइन में ही समाप्त नहीं हो गया था, उसने आगे लिखा था, ' तूने ये शब्द सुने होंगे, न्हेरी दा बुल्ला, तरथल्ली, तो वह है तू. तेरे भीतर-बाहर हर वक़्त एक हलचल मची रहती है. तेरी इतनी हलचल देख कर मैं बुझ जाता हूँ. मैं शांतिप्रिय हूँ. इतना लाउड नहीं हूँ. तुझमें और मुझमें आधारभूत अंतर है, ज़मीन आसमान का. तेरे मेरे बीच का यह अंतर मैं पाट नहीं सकता. अगर तू चाहे तो मैं आगे से तुझे ' आप ' बुलाया करूँ ? अगर तू दोस्ती में विश्वास रखती है तो मुझे दोस्ती मंज़ूर है.'

हे भगवान्, यह सब लिख कर उसने बदतमीजी की हद पार की थी. नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली थी. उसे क्षमा करना प्रभु, वह नादान था. उसे प्यार करने की समझ ज़रूर थी पर उसे अच्छे-बुरे, सही-गलत का ज्ञान नहीं था. वह सिर्फ अपने मन की करना चाहता था. उसने वह हर संभव काम किया था जो उसे बेचैन करने, उसकी शान्ति हरने के लिए उत्तरदायी था. या तो वह उसे नज़रंदाज़ करता था, जिसकी भनक उसे शुरू में ही लग गई थी. (जब बार-बार किसी को कहना पड़े, मुझे फोन करो, मुझे पत्र लिखो, मुझसे मिलो, तो समझ लो, रिश्ते का अंत आ गया है. उसे ज़बरदस्ती कितना आगे तक खींच पाओगे ? ) या उसके प्रति अपने को प्रेमातुर दिखाता था.

उस दिन उसकी प्रेमातुरता चरम सीमा पर थी. अपने शहर वापस लौटने से पहले वाले दिन, अपने मिलन के आखिरी दिन वह आया था, उसके हाथ में लाल गुलाबों का एक बड़ा गुच्छा था. उसने एक-एक गुलाब निकल कर उसे दिया था और बोला था, ' यह उस दिन के लिए जब...... और यह उस दिन के लिए जब...... और यह उस दिन के लिए जब...... उसके सामने लाल गुलाबों का ढेर लग गया था. वह फिर बोला था, भारी आवाज़ में, ' तू इन फूलों को समेट कर, इन दिनों को सहेज कर मेरे वापस आने तक संभाल कर रखना. मैं जल्दी आऊँगा.' आवाज़ में भारीपन ऐसा कि आंसू अब छलके, अब छलके. यह क्या, वो कार में बैठे तो अश्रु धारा उसके गालों पर फिसल रही थी. वह उससे लिपट गया था और भीगी आवाज़ में कह रहा था, ' ये आंसू आज पहली बार निकले हैं किसी के लिए, तेरे लिए.'

वह उस दिन अपेक्षाकृत शांत थी. उसके ह्रदय में गहरे कहीं खुद गया था कि इस रिश्ते में अब दम नहीं है. उसकी रोज़-रोज़ की बेरुखी से वह मुरझाई हुई थी. इतने ज्यादा इमोशनल ड्रामे की उसे उम्मीद भी नहीं थी. लेकिन लाग-लपेट उसने उतना ही दिखाया, जितना वह दिखा रहा था. बल्कि उसके विदा लेते-लेते तो वह वापस पुराने ढर्रे पर आ गई थी और मन ही मन अफ़सोस करने लगी थी कि क्या पता, वही उसे समझ न पाई हो. उसके मन में शायद इतना ही लगाव हो. लेकिन अब उसने जो दोस्ती भरा हाथ बढ़ाया है तो वह भीतर से पीड़ित, आहत, बिखरी हुई, टूटी हुई उससे पूछ रही है, जैसे वह उसके सामने खड़ा हो और वह उसे संबोधित करके कह रही हो, ' बेईमान, दोस्ती ही करनी थी तो उस दिन पीले गुलाब क्यों नहीं लाए ? लाल गुलाब देकर फिर एक गलतफहमी क्यों सौंप गए थे ? '

तो ऐसा था वह. एकदम गरम या एकदम नरम. एकदम मोहाविष्ट या एकदम निर्मोही. एकदम मीठा या एकदम खट्टा. एकदम सजग या एकदम सिरफिरा. बीच का कोई रास्ता उसके पास था ही नहीं. यही उसका स्वभाव था.

उसने अपने को शांतिप्रिय लिखा था. पर सचाई यह थी कि बचपने से भरपूर था वह. चाइल्डलाइक नहीं. चाइल्दिश. हर वक्त कुछ न कुछ बोलते रहना शांतिप्रिय होने की निशानी है क्या ? क्या वह वाकई लाउड नहीं था ? खुद को बेवजह ज़ाहिर करने वाला ? फिर, उससे पूछे कोई कि यह किसने कहा था..... ' तुम्हारे बच्चों का ख्याल न होता तो तुम्हें उठा कर ले जाता..... ' और यह..... ' तुमसे शादी करूंगा तो मुझे एक रेडीमेड फैमिली मिल जाएगी, वाओ...... ' और यह..... ' दहेज़ में तुम कार तो लाओगी ही..... ' यूं उसकी बातें उसे कभी बुरी नहीं लगीं, अच्छी ही लगती थीं. वह जो भी कहता, वह रीझती ही. वह यह भी सोचती, हो सकता है, इतना मनचला वह उसके ही सामने हो, बाकी सब के सामने धीर-गंभीर रहता हो. प्यार चंचल बना देता है. यह उसे भी तो सोचना चाहिए था. हमें जीवन में वैसे ही लोग नहीं मिलते, जैसों की हमें आदत पड़ी होती है. भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग मिलते हैं जिनके साथ हमें हंस के निभाना होता है. यह भिन्नता ही तो जीवन में रस भरती है. पर उसने क्या लिख दिया...... ज़मीन आसमान का अंतर...... यानि दो अलग-अलग धुरियाँ और वह इस अंतर को पाट नहीं सकता...... भई, तुम सीधा ही कह दो, मैं तोड़ रहा हूँ. यह कौन सा ऐसा गुनाह है, जो तुम फांसी पर चढ़ा दिए जाओगे. इस दुनिया में रोज़ दिल टूटते हैं. किसी को पता भी नहीं चलता. टूटा हुआ दिल लेकर लोग सारे काम करते हैं और कोई जान भी नहीं पाता कि वे भीतर खून के आंसू रो रहे हैं. चीज़ें समय के साथ ख़त्म होनी ही हैं पर जिस तरह उसका प्यार ख़त्म हुआ, इस से बेहतर होता, वह मर जाती, सचमुच की मौत. यह जीते जी मरने वाली मौत नहीं, जो उसने उसे दी.

उस मनमौजी का अपना मन होता था तो पूरा-पूरा दिन उसके साथ बिता देता था. उसका मन न हो तो जिद करते रह जाओ, पांच मिनट के लिए नहीं मिलेगा. उस दिन बैठे थे वो दोनों उस रेस्तो-बार में. हैप्पी आवर में जाना उसे बहुत पसंद था. शराब अच्छे रियायती दर पर मिलती थी. पर शराब वह पीता नहीं था. पीता था सिर्फ बीअर. है तो वह भी आखिर शराब ही. वह बेचारी निम्बू पानी से काम चलाती. इस मामले में वह बड़ा भारतीय संस्कारों वाला था. जैसे वह उसकी बीवी हो जो घर से बाहर होटल में बैठ कर बीअर नहीं पिएगी. बीअर के साथ मुफ्त में मूंगफली आती थी. उसे पसंद था फिश टिक्का और चिकन टिक्का. कितनी तो बीअर पी जाता था वह. चढ़ने का नाम नहीं. तो उस दिन सच कमाल हो गया. लंच भी वहीँ, डिनर भी वहीँ, बीच के हैप्पी आवर भी वहीँ. दोपहर के दो बजे से रात के नौ बज गए थे. उन्हें यह ख्याल ही नहीं आया कि बार वाले हैरान हो रहे होंगे. वो कपल के रूप में कपल नहीं लगते थे. इतनी बड़ी औरत इस लड़के के साथ इस शराबखाने में क्या कर रही है ? ओह्हो, इसे शराबखाना कह कर इसकी तौहीन न करो. यह एक फाइव स्टार होटल का शानोशौकत से भरा रेस्तो-बार है. वहाँ निश्चित ही सबने सोचा होगा, यह अमीर महिला इस लडके को साथ लेकर बैठी है. पैसा लुटा रही है. ऐय्याशी के लिए लड़का पाल रखा है. कहीं यह जिगैलो तो नहीं ? कॉल ब्वाय ? लौंडेबाज, साली. उसने सोचा था, वह आगे से ध्यान रखेगी इन सब बातों का. बदनामी वगैरा का. वह तो परदेसी था. उसके पास खोने को क्या था. पर वह तो उसी शहर की थी......

शायद बातें करना ही उसका स्वार्थ हो. वह बातूनी बहुत था. बोले बिना रह ही नहीं सकता था. उस के रूप में उसे एक अच्छी श्रोता मिली हुई थी. वह लगातार बोलता रहता, वह लगातार सुनती रहती. इस शहर में उससे बोलने-सुनने वाला कोई नहीं था. उसे उस पर तरस भी आया था. वह यहाँ अकेला है, कितना अकेला, मेरे सिवा कौन है उसका यहाँ ?

उसके पत्र ने उसे इतना व्याकुल किया कि वह अकेली ही उठ कर फिल्म देखने चली गई. हालाँकि फिल्म देखने का उसे कोई शौक नहीं. बस टाइम पास करने के लिए चली गई. वक़्त काटे नहीं कट रहा था, वक़्त काटने के लिए चली गई. मन बहल नहीं रहा था, मन बहलाने के लिए चली गई. उसने फिल्म ' बरफी ' देखी तो फूट-फूट कर रोते हुए देखी. उसका तारतम्य बैठा, औस्तिज्म बीमारी की शिकार नायिका के साथ. वह भारी मन से घर लौटी. उसके ख्यालों में सिर्फ वह ही वह. उसका अपना वह. रात को सपने में क्या देखती है कि वह उसके साथ सोई हुई है एक ही बिस्तर पर, उसकी ऊँगली में अपनी ऊँगली फंसा कर. उसने आगे देखा, वह ट्रक पर सवार जा रहा है, उससे पीछा छुड़ा कर. वह नादान समझ भी नहीं पा रही उसकी मंशा और ट्रक के पीछे दौड़ी चली जा रही है पुकारती हुई, बफ्फी...... बफ्फी...... घबरा कर उसकी आँख खुल गई. उफ़ ! बस इतना सा ही तो सहारा चाहिए था उसे, ऊँगली में ऊँगली फंसाने जितना. वह कितनी उस औस्तिज्म की शिकार नायिका जैसी है. फिल्म की नायिका का बफ्फी उस पर तरस खा कर उसके पास लौट आया. लेकिन उसका बफ्फी कभी उस पर तरस खा कर प्यार के दो शब्द लिखने वाला नहीं है. उसका ह्रदय चीत्कार कर उठा. बफ्फी.... बफ्फी.... बड़े बेवफा हैं हसीं आजकल के.

वह सोच रही थी और तड़प रही थी और भुन रही थी और भभक रही थी, ' वाह रे मेरे बेवफा प्रेमी, तुम्हें मैं ही मिली थी दिल जोड़ने और तोड़ने के लिए. तुम्हारी उम्र की सारी कन्याएं क्या घास चरने गई थी. ? या मेरी उम्र के किसी दिलजले के साथ मस्ती मार रही थीं ? यह उलट-पुलट कैसे हो जाता है तुझसे भगवान् ? चीज़ें तरतीब से तो रख.'

वह सोच रही थी, ' मुझसे दोस्ती की उम्मीद रखने वाले, दोस्ती में भी एक वफ़ा की ज़रुरत होती है. निभानी पड़ती है दोस्ती भी. प्रेम से ज्यादा मुश्किल होती है दोस्ती. तुम गिनती उल्टी गिनना चाहते हो. अब तुम मुझे ' आप ' बुलाना चाहते हो. क्या पहले ऐसा नहीं करना चाहिए था कि ' आप ' बुलाते, दोस्ती करते, धीरे-धीरे फिर जो रिश्ता ठीक लगता, वह चुनते ? रिश्ते शुरू से शुरू होते हैं, आखिर से नहीं. पहले दोस्ती होती है, बाद में प्यार, न कि इसका उल्टा. और फिर जब मैं तुम्हें पसंद ही नहीं तो दोस्ती भी क्यों ? दोस्ती भी उन से की जाती है जो अच्छे लगते हैं. जिनके जीने के तौर-तरीके हमारे अपने तौर-तरीकों से मिलते हैं. मैं तुम्हारे लिए क्षणिक आवेग, क्षणिक उत्तेजना को शांत करने का माध्यम भर थी. अच्छा होता, हम कभी मिलते ही नहीं.'

वह सोच रही थी, ' कहने को अब कुछ भी नहीं बचा, फिर भी लिख सकती हूँ अनगिनत शब्द तुम्हारे प्यार पर. उससे भी ज्यादा तुम्हारे प्यार के मर जाने पर.'

सोचते-सोचते, उसे लगा, उसका दिमाग बंद हो गया. उसने उसकी चिट्ठी फाड़ी और कूड़ेदान में डाल दी.

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"मेरे नारी चरित्र सुन्दर होते नहीं, सुन्दर प्रतीत होते हैं" - मनीषा कुलश्रेष्ठ

, by शब्दांकन संपादक

आज के सफलतम कथाकार विवेक मिश्र ने, जब मनीषा कुलश्रेष्ठ से उनके अब तक के साहित्यिक सफ़र पर बात करी, तो वो इंटरव्यू भी किसी कहानी से कम रोचक नहीं होना था . ये वाजिब भी है क्योंकि दोनो एक ही दौर के सफल युवा कथाकार भी हैं.


विवेक:-आपकी कहानियों को पढ़कर, आपसे मिलकर, बातचीत करके लगता है कि आपके जीवन में कला का बहुत महत्व है। आपके जीवन में, आपके व्यक्तित्व में एक एस्थेटिक इन्क्लेनेशन है। क्या लेखन उसी रुझान की उपज है, या इसकी और कोई वजह है?


छोटे कस्बे से निकल कर फिर एयरफोर्स के माहौल में आए तो थोड़ा एस्थेटिक एक संक्रमण की तरह आ गया हो तो आ गया हो
मनीषा:-कला अपने शत प्रतिशत विशुद्ध रूप में तो मेरे जीवन में शुरु से नहीं थी. मैं लोक – कलाओं के ज़्यादा निकट रही. मेवाड़ के इलाके में मेरा बचपन बीता, जहाँ मीराँ के भजन लोक में अलग तरह से प्रचलित हैं. कई तरह के लोकनाट्य ‘गवरी’ और ‘वीर तेजाजी’ देखते हुए होश सँभाला है. अपने मन के भीतर उतरती हूँ तो मुझे मिलती है, एक कुतुहल प्रिय लड़की जो कठपुतलियों के खेल, बहुरूपिये, भवाई नृत्य आदि जैसी लोककलाओं के बीच बड़ी हो रही है, एक इतिहास के साए में पल रही है....किले, बावड़ियाँ जहाँ स्थापत्य और मूर्तिकला का उत्कृष्ट स्वरूप खेल – खेल में शामिल है. आईस – पाईस खेल रहे हैं हवेलियों में....बावड़ियों में उतर रहे हैं. मीराँ महोत्सव हो रहा है, देवीलाल सामर आ रहे हैं, कठपुतलियाँ बनाने का बाल शिविर लग रहा है लोककला मण्डल में, जहाँ न केवल हैण्ड पपेट बनानी है, अपनी स्क्रिप्ट लिखनी है, प्रदर्शित भी करनी है.... उसके बाद कॉलेज में आकर कथक सीखा...किश्तों में, थोड़ा बहुत जयपुर घराना. लेकिन विधिवत 35 वर्ष की उम्र में कथक सीखा, जब बच्चे स्कूल जाने लगे. विशारद किया गुरु भगवान दास माणिक और मोहिनी जी की शिष्या होकर, कथक की रायगढ़ शैली में. नियमित मंच प्रदर्शन और नियमित रियाज़ जैसी स्थिति आ नहीं सकी क्योंकि ग्वालियर से तबाद्ला हो गया, मगर कथक से जुड़ाव हमेशा रहेगा.
एस्थेटिक ! मुझे तो अपना सब कुछ ‘गँवई’ और ‘प्राकृतिक’ लगता है. हो सकता है इस गँवई और प्राकृतिक का अपना सौन्दर्यबोध होता हो.
लेखन, मेरे लम्बे एकांत से उपजे कल्पना जगत का परिणाम है. जिला शिक्षा अधिकारी माँ और बी.डी.ओ. पिता हमेशा अपनी – अपनी जीपों में टूर पर रहते थे. मैं और मेरा भाई घर पर. किताबों के लिए पूरी लाईब्रेरी उपलब्ध थी, कोई सेंसर नहीं था, सो जो मिलता पढ़ डालते. आठवीं – नवीं में ही शंकर का ‘चौरंगी’ , बिमल मित्र का ‘साहिब बीवी और गुलाम’ , खाँडेकर का ‘ययाति’. हिन्द पॉकेट बुक से छपी अनूदित नॉबकॉव की ‘लॉलिटा’, स्वाइग की ‘एक अनाम औरत का ख़त’, हॉथार्न की ‘ द स्कारलेट लैटर’ पढ़ डाली थीं. और ऎसा नहीं था कि समझ नहीं आती थीं, खूब समझ आती थीं.
अब इस माहौल में तो कोई भी पलता, आखिरकार कुछ तो लिखता ही, और जो लिखता उसमें इसकी छवि होती न ! बाकि छोटे कस्बे से निकल कर फिर एयरफोर्स के माहौल में आए तो थोड़ा एस्थेटिक एक संक्रमण की तरह आ गया हो तो आ गया हो. बाकि हम लोग अपने भीतर कतई स्यूडो अंग्रेज़ीदाँ नहीं हो सकते. न मैं न मेरे पति अंशु. हम अब भी साधारण से जीव हैं.


विवेक मिश्र (बाएं) ललित शर्मा, अजय नावरिया, अंशु कुलश्रेष्ठ व मनीषा कुलश्रेष्ठ (दायें) के साथ

विवेक:-आप ठीक-ठीक अपने लेखन की शुरूआत कहाँ से मानती हैं और उस शुरुआत से लेकर आज तक इस सफ़र के महत्वपूर्ण पड़ाव कौन-कौन से हैं?

मनीषा:-मेरे लेखन की शुरुआत ‘हंस’ के उस पत्र से हुई है, जिसे मैंने करगिल के बीच ही जुलाई 1999 में राजेन्द्र यादव को लिखा था ‘किसकी रक्षा के लिए’, जिसे उन्होंने ‘बीच बहस में’ छापा था. यादव जी को याद होगा, हंस मॆं भी उस की प्रतिक्रिया में कितने पत्र आए थे, मेरे पास तो रोज़ बीस – पचीस पत्र आते ही थे, ‘नाल’ जैसी जगह में, जो बीकानेर से भी 15 किमी दूर एक उजाड़ जगह है. तब लगा, मेरे शब्द संप्रेषित होते हैं. उसके बाद महत्वपूर्ण पड़ाव, हंस में पहली कहानी का छपना, ‘कठपुतलियाँ’ कहानी का व्यापक तौर पर स्वीकारा जाना, एक युवा कहानीकार के तौर पर पहचान, फिर ‘शिगाफ’ उपन्यास निसंदेह. मैं लिखे जाने और उस लिखे हुए को स्वीकारे जाने को ही पड़ाव मानती हूँ.
मेरे लेखन की शुरुआत ‘हंस’ के उस पत्र से हुई है, जिसे मैंने करगिल के बीच ही जुलाई 1999 में राजेन्द्र यादव को लिखा था

विवेक:-इस साहित्यिक सफ़र का चर्मोत्कर्ष कब आया?, या अभी लगता है कि उसे आना बाकी है?

मनीषा:-अभी शुरुआत ही है. मैंने अब तक अपनी हर रचना डर – डर कर लिखी है. शिगाफ़ लिखते हुए और अंत तक आते – आते मेरी धैर्यहीनता की वजह से मुझे कतई विश्वास नहीं था कि एक गैर कश्मीरी की तरफ से लिखे इस उपन्यास को ज़रा भी तवज्जोह मिलेगी. वह छपा और मैं साँस रोक कर बैठ गई. किताबों की भीड़ में उसका विमोचन हुआ. न प्रकाशक ने कष्ट किया, न मैंने किसी से कहा भी नहीं कि इसे पढ़ो....यकीन मानिए किसी को नहीं.
शिगाफ़ लिखते हुए और अंत तक आते – आते मेरी धैर्यहीनता की वजह से मुझे कतई विश्वास नहीं था कि एक गैर कश्मीरी की तरफ से लिखे इस उपन्यास को ज़रा भी तवज्जोह मिलेगी. 
एक साल शांति रही, फिर यहाँ – वहाँ से आवजें उठीं...शिगाफ पढ़ा. शिगाफ पढ़ा? यार शिगाफ पढ़ा ! शिगाफ पढ़ना है! मुम्बई से कोई फिल्मकार फोन करके कहता ज्ञान रंजन जी ने कहा था इसे पढ़ने को, कोई कहता राजेन्द्र जी ने कहा ‘शिगाफ’ पढो, मगर सीधे मुझे किसी वरिष्ठ ने कुछ नहीं कहा, और मैं एकलव्य की तरह अपने एकांत में खुश होती रही. ( अपनी किताब पर फोन कैम्पेन चलाना, अपने वरिष्ठों पर मौखिक दबाव बनाने से ज़्यादा शर्मनाक मुझे कुछ नहीं लगता) मेरी किताबों की समीक्षाएँ आईं हैं, इसी ईमानदारी के साथ. पहला उपन्यास लिखकर मैं अपने पहले इम्तहान में पास थी बस ! इसलिए यह चरमोत्कर्ष कैसे हो सकता है, यह बस शुरुआत थी. हालांकि लोग डराते रहे, कि ‘शिगाफ’ से बेहतर लिखो तब ही लिखना, मगर मुझे यह बात नहीं जमी, मैं खराब भी लिखती रही तो भी लिखूँगी चाहे अपनी उँगलियों की खुशी के लिए ही सही. मैंने नॉवेला लिखा ‘शालभंजिका’ लोगों ने शिगाफ से तुलना की मगर उसे भी पसन्द किया उसके अपने फ्लेवर की वजह से. साहित्यिक सफर का चरमोत्कर्ष न ही आए तो अच्छा क्योंकि फिर ढलान शुरु होता है, हालांकि एक जीव विज्ञान से ग्रेजुएट होने के कारण जानती हूँ, मस्तिष्क में भी रचनात्मक न्यूरॉंस की एक उम्र होती है, फिर भी हम सब की नियति देवानन्द, मनोजकुमार की बाद की फिल्मों की सी हो जाती है......
मेरी नज़र चरम पर है नहीं है, मुझे लिखने में जब तक मज़ा आएगा लिखूँगी. नहीं तो हो सकता है, मैं फोटोग्राफी करने लग जाऊँ, कोरियोग्राफी करने लगूँ, वन्य जीवों पर काम करने लगूँ. हिन्दी में ही कहानी किस्से छोड़ विज्ञान – लेखन करने लगूँ.

विवेक:-अपनी रचनाओं में से यदि कहूँ किन को लिख कर कर आपको गहरी आत्म संतुष्टि हुई, या इससे उलट पूँछू कि अपनी ही किस रचना से आप संतुष्ट नहीं हैं और उसे समय आने पर दोबारा लिखना चाहेंगी?

मुझमें ‘मोहन राकेश’ जैसा धैर्य नहीं है कि अपनी किसी छपी – छपाई कृति को तीन बार लिखूँ
मनीषा:-ईमानदारी से कहूँ तो....अभी तक किसी रचना से गहरी आत्मसंतुष्टि नहीं हुई. सब को जब पढ़ती हूँ, तो लगता है, इसे यूँ लिखा जा सकता था. हाँ, ‘शिगाफ़’ में भी लगता है. ‘शालभंजिका’ मैं दुबारा लिखना चाहती हूँ, ख़ास तौर पर ‘पद्मा’ के चरित्र को गहरा करना चाहती हूँ. लेकिन मैं करूँगी नहीं, क्योंकि प्रेम के उस स्वरूप से मेरा बुरी तरह मोहभंग हो गया है. मैं जानती हूँ, मुझमें ‘मोहन राकेश’ जैसा धैर्य नहीं है कि अपनी किसी छपी – छपाई कृति को तीन बार लिखूँ...! मुझे तो लगा कि तीसरी बार लिख कर उन्होंने ‘लहरों के राजहंस’ को ओवरडन कर दिया था.

विवेक:-आपकी कहानियों के नारी चरित्र अन्य स्त्री लेखकों के नारी चरित्रों से अलग खड़े दिखाई देते हैं, सुख में-दुख में, शोषण में, बुरे से बुरे समय में भी वे कहीं न कहीं सुंदर हैं। वे अपनी नज़ाकत और नफ़ासत के साथ हैं, ऐसा क्यूँ?

मनीषा:-क्योंकि हर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अलग होता है. मैं अन्य स्त्री लेखकों से अलग हूँ, मैं विमर्श नहीं जीवन लिखती हूँ. मैं विशुद्ध कला नहीं ‘मन’ और ‘मनोविज्ञान’ लिखती हूँ. मैं सपनों के बीच सोते संघर्ष और संघर्षों में ऊँघते सपने लिखती हूँ. मेरे नारी चरित्र सुन्दर होते नहीं, सुन्दर प्रतीत होते हैं. क्योंकि ‘स्किन डीप ब्यूटी’ वे अपने में लिए चलते हैं. मुझे इस सृष्टि में कुछ भी बदसूरत नहीं लगता. बूढ़ी कालिन्दी, न्यूड मॉडलिंग करती हुई ‘कला’ को अभिव्यक्त करने का साधन है, उसकी झुर्रियों में सुन्दरता है, अनुभव की. मैं आज तक किसी बदसूरत स्त्री से नहीं मिली हूँ ! मुझे तो स्वयं पारिभाषिक तौर पर तयशुदा सुन्दर स्त्रियाँ बल्कि ‘रिपल्स’ करती हैं.

विवेक:-आपकी रचनाओं में जीवन उदात्त रूप में उपस्थित है, पर समय और समाज की राजनैतिक स्थितियों और उसमें रचनाकार की अपनी विचारधारा बहुत स्पष्ट नहीं है, वह प्रछन्न है। कहीं-कहीं यथास्थितिवाद का समर्थन भी करती लगती है, आप इस पर क्या कहेंगी?

यह भीषण अविश्वास का दौर है....किस पर विश्वास प्रकट करूँ?
मनीषा:-हाँ, जीवन ही सर्वोपरि है, बहुस्तरीयता में, अपने गुंजलों में. सवाल के दूसरे भाग से मेरी असहमति है. समय और समाज़ की राजनैतिक स्थितियाँ मेरी रचनाओं में समय से पूर्व एक पूर्वाभास की तरह आई हैं. जब खाप पंचायतों की तरफ से मीडिया सोया था, बल्कि मैं ‘खाप’ शब्द से अपरिचित थी, तब मैंने लोक पंचायत को लेकर ‘कठपुतलियाँ’ लिखी थी. अभी ‘मलाला’ पर हमला तो बहुत बाद में हुआ, हम लोगों को उसका नाम भी बाद में पता चला...मेरी कहानी ‘रक्स की घाटी -शबे फितना’ हंस के अगस्त अंक में आ गई थी. ‘शिगाफ’ तो है ही...रही बात मेरी राजनैतिक विचारधारा की ! कौनसी राजनैतिक विचारधारा ऎसी है जिसमें मैं अपना सम्पूर्ण विश्वास प्रकट कर सकूँ? यह भीषण अविश्वास का दौर है....किस पर विश्वास प्रकट करूँ?
समाधान की नीम हकीमाना पुड़िया मैं कभी नहीं बाँध सकती
वैसे तो किसी रचनाकार की राजनैतिक विचारधारा का चला कर, प्रकट तौर किसी कहानी या उपन्यास में आना लेखन में फूहडपन ही माना जाएगा. रही बात अपनी कथा के माध्यम से किसी सामाजिक राजनैतिक विषम स्थिति के प्रति अपना विरोध स्थूलता के साथ प्रकट करने की, या किसी कथानक के ज़रिए कोई नारा उछालने की मंशा तो मेरी आगे भी नहीं रहेगी, ऎसा करना होता तो अपने भीतर किसी प्रछन्न विचारधारा को आवेग में लाकर ‘शिगाफ’ में मैंने कश्मीर समस्या का कोई अव्यवहारिक हल पकड़ा दिया होता! वह सरल होता मेरे लिए, बहुत ही सरल, मेरा मन जानता न कि यह झूठ है, अव्यवहारिक है. फिर क्या वह पठनीय भी होता? और विश्वसनीय तो कतई नहीं होता. मेरे भीतर के कहानीकार का यह विश्वास मरते दम तक बना रहेगा कि मेरी कहानी ‘दिशा सूचक’ बोर्ड हो सकती है...कि ‘एक बेहतर, संभावित रास्ता इधर को ...’ मगर समाधान की नीम हकीमाना पुड़िया मैं कभी नहीं बाँध सकती. मेरे नारी पात्र अपनी शर्तों पर जीते हैं, अपनी तरह से विरोध दर्ज करवाते हैं, मगर उनके अपने मोह और कमज़ोरियाँ हैं...हाँ यह सच है कि उनमें से ज़्यादातर ‘घर’ नाम की पैरों के नीचे की ज़मीन को खोने से भय खाते हैं, मातृत्व के हाथों हारते हैं...... मुझे एक कहानीकार के तौर पर दबाव रहे हैं कि मैं अपना राजनैतिक रुझान स्पष्ट करूँ ! अब तो मैंने भी एक उम्र जी ली, संसार घूम लिया, मैं लेफ्ट, राईट, सेंटर सबकी आउटडेटेड, अव्यवहारिक, अवसरवादी नीतियों को देख चुकी, भारतीय राजनीति का बहुरंगा चेहरा किस से छिपा है? हमारे यहाँ भी लोग झण्डा वाम का, फण्डा सत्ता का, दिखावा सेकुलर होने का और कलाई पर कलावा बाँध घूमते हैं. क्या उनके राजनैतिक रुझान कनफ्यूज़िंग नहीं? क्योंकि मेरा ही नहीं इस अविश्वास के दौर में किस युवा का राजनैतिक रुझान क्या हो सकता है? ऎसे में अपॉलिटिकल होना ही सुझाता है, बिना झंडा उठाए या किसी झण्डे तले बैठे भी आप सही के साथ और गलत के विरोध में हो सकते हैं. हम किसी फ्रेम से बाहर, एक नए विचार की तलाश में निकले लोग हैं, जो विचार के नाम पर बँटना नहीं चाहते।
ऎसे में उदासीनता...डेलीबरेट नहीं विवशता है....फिर भी....अपॉलिटिकल न रहने देने का दबाव मुझ पर बना हुआ है. मैं जिस से जुड़ सकूँ ऎसी राजनैतिक विचारधारा को अब समय के हिसाब से अपडॆट होना होगा.

विवेक:-आपकी भाषा प्रवाहमय है, पर वह कहानी दर कहानी बदलती है, जिससे कहानीकार की अपनी छाप कमजोर पड़ती है। इसे आप अपनी शक्ति मानती हैं या कमज़ोरी?

मनीषा:-छाप बहुत सीमित शब्द है. भाषा अनंत है. देखिए सच में मेरे पास भाषा अपने समृद्ध रूप में है, और मुझे परिवेश के अनुसार भाषा के साथ बदलाव भाता है, जैसा कि मैं समझती हूँ, सिग्नेचर स्टायल जिसे कहते हैं, वह लेखक को सीमित करती है. सिग्नेचर स्टायल होना, कहानीकार का अंत है, विविधता का अंत है, ऎसा होने पर पाठक पर आपके फॉर्मूलाबद्ध लेखन की पोल खुल जाती है. मैंने प्रियंवद की कहानियों को बहुत गहरे से पढ़ा – बार – बार पढ़ा, मगर अंतत: एक ऎसा समय आया कि लगने लगा, उनके लिखने में एक फॉर्मूलाबद्धता है, इतना इतिहास, इतना विद्रूप, इतना अटपटापन, इतना विचार, इतना दर्शन, इतना प्रेम, इतनी देह और, इतनी भाषा की जगलरी.... ये इनके इनग्रेडियेंट्स हैं....फिर मैं ऊबने लगी. मैं अपनी भाषा की विविधता को कमज़ोरी नहीं मानती. मेरे पास अगर अच्छी हिन्दी, अच्छी उर्दू है, मेरे पास लिखने के तरह तरह के अन्दाज़ हैं, मैं अपने और अपने दोस्तों की बदौलत कहानियों में परिवेश के अनुसार कश्मीरी, मलयालम, स्पेनिश, मेवाड़ी का हल्का - सा शेड ले आती हूँ तो वह सबको भाता ही है. सौ बात की एक बात - मैं बहुत अस्थिरमना हूँ, मैं शायद एक फॉर्मूलाबद्ध लेखन नहीं कर पाऊँगी, इसी ज़िद के साथ बहुत आगे जाकर, कभी कोई ‘सिग्नेचर स्टायल’ बन जाये, तो बन जाए.

विवेक:-समकालीन कथा साहित्य को आप किस तरह देखती हैं और इसकी कौन-सी प्रवृत्तियाँ आपको इसके भविष्य के लिए आश्वस्त बनाए रखती है?

मनीषा:-समकालीन कथा साहित्य, एक बदलाव लेकर उपस्थित हुआ है. सच पूछिए तो बड़ा अजब – गजब समय है. यह तो एक जुमला ही बन गया है कि तीन - तीन – चार – चार पीढियाँ साथ लिख रही हैं. विषयों की विविधता देखें तो एक ओर महेश कटारे एक ओर ‘कामिनी काय कांतारे’ लिख रहे हैं, भवभूति पर बहुत शोध के बाद लिखा एक जीवंत उपन्यास. तो एक तरफ संजीव ‘रह गई दिशाएँ उस पार’ लिख रहे हैं, विज्ञान फंतासियों की तर्ज पर. हमारे युवा साथी, कॉर्पोरेट सेक्टर के टूल बनते युवाओं से लेकर आदिवादी युवकों पर लिख रहे हैं, सिमट रहे घरेलू ग्रामीण उद्योगों पर, नरेगा पर, शहरी किशोरों के मनोविज्ञान पर, एक ओर स्त्री के गहन मन की कहानी लिखी जा रही है तो दूसरी ओर बिलकुल देह के आदिम राग ! मुझे बहुत सकारात्मक लगता है यह वैविध्य ! और इसकी प्रवृत्तियाँ मुझे आशांवित करती हैं, समकालीन कथा साहित्य ने अपना दायरा विस्तृत किया है. लेखक ने बहुत छूट ली है, कथ्य, भाषा और प्रयोग के स्तर पर और वह छूट और प्रयोग स्वीकृत हुए हैं. कथासाहित्य द्वारा बार – बार अपना ही खाँचा तोड़ने से, तट बदलने से इसके प्रवाह में कोई बाधा नहीं आने वाली, बल्कि तकनीकी इसे जन – जन तक स्वीकृत करवाएगी.

साभार 'लमही' जनवरी-मार्च 2013

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हंस फरवरी 2013 "हिंदी सिनेमा के सौ साल"

, by शब्दांकन संपादक


पूर्णांक-316 वर्षः 27 अंकः 7 फरवरी 2013 

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मेरी तेरी उसकी बात 

  • मेरे फिल्मी रिश्ते: राजेन्द्र यादव

 

अतिथि संपादकीय 

  • सिनेमा की बात: संजय सहाय

 

विशेष 

  • किसी एक फिल्म का नाम दो: ओम थानवी
  • सिनेमा में शेक्सपीयर: ओथेलो से ओंकारा तक: विजय शर्मा

 

कहानियां

  • रेप मार्किट: गुलजार
  • चुड़ैल: अभिराम भडकमकर

 

बातचीत 

  • गर्त में जा रही है कल्पनाशीलता: बासु चटर्जी से बातचीत
  • सेंसरशिप अपमानजनक है: गौतम घोष से बातचीत
  • नया सिनेमा छोटे-छोटे गांव-मोहल्लों से आएगा: अनुराग कश्यप से बातचीत
  • अतीत की नहीं भविष्य की सोचिए: गोविंद निहलानी से बातचीत
  • नजरअंदाज करना भी एक राजनीति है: सुधीर मिश्रा से बातचीत
  • सर्जनात्मक जोखिम लेने वालों का था नई धारा का सिनेमा: श्याम बेनेगल से बातचीत
  • गहरी बातों को सरल भाषा में कहना जरूरी है: ओमपुरी से बातचीत
  • सिनेमा अंततः मनोरंजन का माध्यम है: चंद्रप्रकाश द्विवेदी से बातचीत
  • सिनेमा अभिव्यक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम है: कमल स्वरूप से बातचीत

 

सदी के सरोकार

  • समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया: तत्याना षुर्लेई
  • हिंदी समाज और फिल्म संगीत: पंकज राग
  • नेहरू युग का सिनेमा: मेलोड्रामा और राजनीति: प्रकाश के. रे
  • सिनेमा की हिंदी: भाषा के भीतर की भाषाएं: चंदन श्रीवास्तव
  • सिनेमा के शताब्दी वर्ष में दस सवाल: विनोद भारद्वाज
  • क्षेत्राीय भाषाओं का सिनेमा: मनमोहन चड्ढा
  • औघड़ फिल्म उद्योग का शताब्दी उत्सव: जयप्रकाश चैकसे
  • मनोरंजन के बाजार में आदिवासी: अमरेंद्र किशोर
  • अतिक्रमण ही अश्लीलता है: शीबा असलम फ़हमी
  • पोर्न फिल्मों की झिलमिल दुनिया: फ्रैंक हुजूर

 

शख्सीयत

  • भारतीय सिनेमा और व्ही.शांताराम: सुरेश सलिल
  • आम आदमी की पीड़ा का कवि: तेजेंद्र शर्मा
  • सिनेमा के प्रयोगधर्मी साहित्यिक किशोर साहू: इक़बाल रिज़वी

 

परख

  • संस्मरणों में गुरुदत्त: सुरेश सलिल
  • खुद की तलाश का लेखाजोखा: प्रेमचंद सहजवाला

 

फिल्म समीक्षा

  • लाल झंडे और नीले रिबन के बीच: उदय शंकर

 

कसौटी

  • मीडिया: फिल्म इंडस्ट्री की प्रोपेगंडा
  • मशीनरी: मुकेश कुमार

 

सृजन परिक्रमा

  • परसाई के बहाने व्यंग्य चर्चा: दिनेशकुमार

 

कदाचित

  • जफर पनाही और हम: संगम पांडेय

  

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वक्त रहते - जनसत्ता, चौपाल - भरत तिवारी

, by शब्दांकन संपादक

कच्चा लालच, बदगुमानी, ओछी राजनीति और जुड़े को तोड़ना, ये हमारे वे दुश्मन हैं जो पीठ पीछे वार नहीं करते।
आज एक तरफ मनुवादी अपने गलत को सही सिद्ध करने के लिए कुछ भी करने पर उतारू हैं, तो दूसरी तरफ अमनुवादी भी उन्हें गलत सिद्ध करने के लिए वैसा ही कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि देश का प्रगतिशील वर्ग दोनों की बातों से सहमत नहीं होता दिखता। उसे दोनों ही पक्षों में घृणा का स्वर सुनाई देता है। शायद इसलिए कि ये वे स्वर हैं, जिनके खिलाफ होकर ही वह प्रगति कर सका है या जात-पात आदि से ऊपर उठ सका है। उसकी दुविधा तब और बढ़ जाती है, जब उसे यह स्वर अपने बहुत करीब सुनाई देता है। ऐसी स्थिति में अगर वह मनुवाद का स्वर हो और वह न सुने तो उसे अमनुवादी ठहरा दिया जाता है और यदि विपरीत स्वर हो और वह अनसुना कर दे तो उसे मनु समर्थक कहा जाता है।

    इस बात पर ध्यान देना बहुत जरूरी है कि इन दोनों तरह के वादों से सरोकार नहीं रखना ही उसका प्रगति-पथ है, जिसे वह नहीं छोड़ना चाह रहा है। बीते कुछ वर्षों में इन स्वरों की मुखरता ने उसे पथ से विचलित भी किया है। सवाल है कि यह राष्ट्र के लिए कितना घातक हुआ? वह नागरिक जो सर्वधर्म समभाव की नीति पर गर्व से चल रहा था, जिसके लिए राष्ट्र ही धर्म था, जिसे सिर्फ तिरंगे से प्यार था, उसी ने लाल, हरा, नीला, पीला या काला झंडा हाथ में ले लिया, जिसका अब तक वह विरोधी रहा है।

    कई दफा दिमाग को कोरा करके सोचने पर ही स्वस्थ निर्णय सामने आ पाता है। इन मुद्दों पर निष्पक्ष होकर गौर करना जरूरी है, सवालों की तह तक पहुंचना जरूरी है। कच्चा लालच, बदगुमानी, ओछी राजनीति और जुड़े को तोड़ना, ये हमारे वे दुश्मन हैं जो पीठ पीछे वार नहीं करते। गंभीर बात है कि ऐसा वार करने वालों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि हमारे सही और गलत को समझने की प्राकृतिक इंद्रियबोध-शक्ति उनके प्रभाव से कम होती जा रही है। ये सिद्धहस्त लोग अब इस स्तर के हो गए हैं कि वे बड़ी से बड़ी दुर्घटना को भी ठीक सांप्रदायिक लोगों की तरह जात-पात का जामा पहनाने लगे हैं। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि ‘जुड़े को तोड़ना’ की नीति से फायदा किसे पहुंचता है।

    कितने पत्ते हमने इन्हें दे दिए हैं खुद से खेलने के लिए! क्या आप जानते हैं कि ये वे लोग हैं, जो इंसान तो दूर, उसकी जाति को भी हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई आदि की नजर से नहीं, बल्कि सिख बनाम मुसलिम, हिंदू बनाम मुसलिम, सिख बनाम हिंदू, गरीब बनाम अमीर, मराठा बनाम बिहार, दलित बनाम सवर्ण आदि की नजर से देखते हैं। अगर हम उनकी इस नजर को नहीं पहचानते तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकलने वाला। अब जो ये नया कार्ड हम इन्हें दे रहे हैं ‘मनुवाद बनाम अमनुवाद’ यह तुरुप का पत्ता है, जो ‘जुड़े को तोड़ना’ को कितनी ताकत दे रहा है, इसका हमें शायद अंदाजा नहीं है। इसे खेल कर वे जघन्य अपराधों को भी हमारे सामने ऐसे रख रहे हैं कि वे हमें जघन्य न लगें। आम बातचीत को भी यों तोड़-मरोड़ कर सामने रख देते हैं कि हमारा आपसी सामंजस्य बिगड़ जाए।

    जिस कृत्य से सारे समाज को क्षति पहुंचे, वह हमें अपनी क्षति नहीं लगे, तो सोचिए कि कैसी स्थिति होगी। कोई बात बगैर पूरा संदर्भ दिए अगर अनर्थ के रूप में सुनाई जाए तो क्या होता है? आज वक्त है कि हम इन राजनीतिक ‘वादों’ को दफन करें और एक होकर चलें। यह करना आसान नहीं होगा, क्योंकि इनकी जड़ें बहुत गहरी और कांटों से लैस हैं और उन्हें उखाड़ने में हमें पीड़ा होगी। लेकिन जान लें कि अगर हमने यह पत्ता उनके पास रहने दिया तो आने वाले वक्त में होने वाली दुर्घटना अगर आपके साथ होती है तो आप अकेले होंगे और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

    भरत तिवारी, शेख सराय, नई दिल्ली
साभार जनसत्ता 31 जनवरी, 2013 "चौपाल"
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